विरुद्ध viruddh - Hindi story

  

विविध - अभिव्यक्ति - Poetry in Hindi.

Guest post :-

विरुद्ध (हिंदी कहानी) / Viruddh ( HINDI STORY with poetry)

बेहद खूबसूरत कविताओं के साथ ये कहानी आप सबके समक्ष प्रस्तुत है -


गुड़गांव से निशिकांत देवर्थ  की  रचना / कहानी (कविता के माध्यम से सुंदर अभिव्यक्ति के साथ) :- 

विरुद्ध / Viruddh

मन, दुनिया,हालात और हकीकत ये सब एक दूसरे से हमेशा अलग होते हैं। पर ये साथ सब मिलकर बहुत कुछ बना सकते हैं,  उन्हीं में से एक है - विरुद्ध। 
अक्सर हमने सुना होगा - ये भावनाओं के विरुद्ध है, ये धर्म विरुद्ध है, ये नियमों के विरुद्ध है और ये इंसान दुनिया के विरुद्ध है। ऐसे ही एक इंसान की बात यहां है।

(पहला अध्याय)

मन..........

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साल 1965

        हरियाणा का एक छोटा सा गाँव - निर्जन। ये गाँव भी आम दुनिया सा ही है। वही दिन, वही सूरज का चमकना, वही लोगों की चहलपहल।

        गांव की चौपाल में कुछ बुज़ुर्ग हुक्का गुड़गुड़ा रहे हैं। और सामने की पाठशाला की कक्षा में मास्टर जी पढ़ा रहे हैं। सभी बच्चे बड़े ध्यान से मास्टर जी की बातें सुन रहे थे। 

        कक्षा में 20 बेंचो पर 39 बच्चे बैठे थे। सभी बच्चे 2-2 के जोड़ों मे थे, पर आखिरी बेंच पर एक बच्चा अकेला बैठा था।उसका ध्यान सभी बच्चों की तरह था तो मास्टर जी की बात पर ही, पर दिमाग़ कुछ और ही सोच रहा था। 

        आम तौर पर हम जो सुनते हैं, वही समझते है और उसे ही सोचते है, पर यहां हकीकत कुछ और है। यहां वो बच्चा सोच रहा है कि सब जो सुन रहे हैं और जो मास्टर जी सुना रहे हैं वो सुनना ज़रूरी क्यू है? क्यों सभी को एक समान समझा जाता है? क्यों ऐसा है कि सबको इस एक ही तरह के ज्ञान की ज़रूरत है? क्यों हर एक चीज को मजबूरी बना दिया जाता है? 

एकटक खिड़की को घूरते हुए बस यही सवाल । तभी घंटी की आवाज आती है। यही है कहानी का मुख्य पात्र निकुंज।

      निकुंज दिखने मे आम बच्चों सा ही था, पर खामोश था। दिमाग़ में ब्राह्मण लेकर चलने वाले अक्सर शब्दों का कण भी नहीं निकाल पाते।निकुंज के मन के सवाल इतने बड़े थे कि उनके जवाब उसे दुनिया में मिल ही नहीं पाते थे। क्योंकि मन, हालात, हकीकत और दुनिया सब एक दूसरे से अलग होते है पर निकुंज ये बात मानना नहीं चाहता था। क्योंकि, ये भी उसका एक सवाल ही था।अगर ये सब अलग है,तो क्यू? 

       शायद यही कारण था कि वो आखिरी बेंच पर हमेशा खुद को अकेला ही पाता था। क्योंकि उसके सवाल कभी उसके मन से बाहर तो नहीं आये पर लोगो को उसके चहरे पर एक अजीब सी बेचैनी दिखाई देती थी। और दुनिया का ये भी एक नियम अजीब है कि लोग अजीब लोगों से दूर ही रहते हैं। और यही कारण है कि कभी कभी अजीब /अलग लोग विरुद्ध बन जाते है।


" कुछ अधूरे ख्याल तो कुछ अधूरे सवाल हैं।

 या तो मैं कमाल हूं या ये दुनिया बाकमाल है।।"


(दूसरा अध्याय )

दुनिया.......

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साल 1978

         काफ़ी सालों तक ऐसा ही चलता रहा। अब निकुंज की पढ़ाई पूरी हो चुकी थी और बारी थी दुनिया से रूबरू होने की। निकुंज जैसे संवेदनशील इंसान के लिए ये दुनिया हमेशा असंवेदन ही रही। जिसने अपनी जिंदगी का एक बड़ा हिस्सा अकेले और ख़ामोशी में निकाला हो, उसे ये दुनिया की भीड़ और शोर बहुत परेशान करने वाले थे।

       अपनी पढ़ाई पूरी होने के बाद निकुंज नौकरी की तलाश में दिल्ली आ गया। दिल्ली, ये शहर कुछ लोगों के लिए जन्नत है तो कुछ के लिए उनकी जिंदगी। लोगो का मानना है कि ऐसे बड़े शहरों मे कामयाबी मिलने के बहुत से मौके मिलते हैं।

        पर निकुंज की कामयाबी दुनिया क़ी कामयाबी से अलग थी। आम तौर पर लोग कामयाबी, एक अच्छी नौकरी या व्यापार, अच्छी कमाई, ज़्यादा सम्पत्ति को कहते हैं। पर निकुंज के लिए ये तो कामयाबी हरगिज नहीं थी। असल में कामयाबी (success ) है क्या? 
       कामयाबी, वही जो मिलने के बाद इंसान के मन को शांति मिले। उसकी व्यक्तिगत (पर्सनल),आंतरिक (इंटरनल ) परेशानियां कम हो जाये। पर इस दुनिया के लिए कामयाबी का मतलब है, जिसे वो दूसरों को जलाने के लिए दिखा सके। जिसके सहारे वो कमज़ोरों पर रोब जमा सके, और जो उनके घमंड को और भी बढ़ा दे। 
      निकुंज को इन सब चीजों मे कोई दिलचस्पी नहीं थी। इसीलिए वो जहाँ भी काम करता, ज़्यादा समय नहीं टिक पाता था। उसे कुछ काम किसी ना किसी के स्वार्थ से जुड़े हुए लगे, तो कुछ काम सिर्फ लोगों को लूटने वाले लगे।और कुछ कामों में उसे अपने स्वाभिमान को ताक पर रखना पड़ा जो उसे मंज़ूर नहीं था। जल्दी ही उसे ये समझ आ गया कि दुनिया जिस मंज़िल यानी पैसा, नाम, शोहरत, दौलत के पीछे लगी है वो उसकी मंज़िल नहीं। 
       पर अब सवाल ये था कि उसकी मंज़िल क्या है? और बात ये भी थी कि बिना नाम, पैसा शोहरत के उस पर कोई ध्यान भी नहीं देगा। तब उसने फैसला किया कि जीना तो ऐसे ही पड़ेगा। पैसा तो उसे भी कमाना होगा। पर वो ज़ब भी कहीं काम करने गया, उसे असफलता या बेइज्जती का सामना करना पड़ा। तो उसने सोचा कि दुनिया को झुकाने का, अपना रास्ता बनाने का इज्जत पाने का एक ही तरीका है। उसने हथियार उठाने का फैसला किया। उसके दिमाग़ में ख्याल था कि जिस दुनिया ने उसकी सादगी, शराफ़त और साफ मन का कोई मोल नहीं रखा उसके खिलाफ वो हथियार उठाएगा। तब उसने लूट पाट शुरू की और समाज के सम्पन्न लोगों को हथियारों के बल पर लूटने लगा। 
      फिर निकुंज के मन में एक दिन ख्याल आया कि शायद वो इस दुनिया में एकलौता ऐसा इंसान ना हो, जो इस समस्या से जुझ रहा है। तब उसने अपने जैसे समाज के ठुकराये और सताये लोगों को अपने साथ जोड़ना शुरू किया। जल्दी ही उसने एक बड़ा गिरोह खड़ा कर लिया। क्योंकि, जब कुछ लोगों के पास आगे बढ़ने का कोई रास्ता या वजह नहीं होती तो वो इस तरह के रास्तों को चुनने से पहले नहीं सोचते। ये समय निकुंज को एक बात और सिखा रहा था कि समाज कितना निर्दयी और स्वार्थी हो चुका है। 
     उसके बाद उसे अपनी लूट पाट की गतिविधियों में बढ़ोतरी की। उसने सैकड़ों रईसों की तिजोरयां खाली कर दी। पर कभी किसी ने उसका चेहरा या उसके गिरोह के किसी भी इंसान का चेहरा नहीं देखा था। ना ही कोई जानता था की ये सब कौन कर रहा है। अब नीकुंज ने इस दहशत को एक नाम देने काफैसला किया ताकि सब जान ले कि -


अभी तो शुरुआत हुई है नाइंसाफी के इंतकाम की ।

अब पूरी दुनिया में होगी दहशत 'मृत्युंजय' नाम की।।


मृत्युंजय, निकुंज ने  ये नाम अपने गिरोह को दिया क्योंकि मृत्युंजय का अर्थ है, जिन्होंने मृत्यु पर विजय प्राप्त कर ली हो या जिसे अब जीवन मृत्यु का भय ना रहा हो। इसके बाद आस पास के पूरे इलाके में मृत्युंजय ने बहुत से रईसों को बर्बाद कर डाला। लूट के पीछे केवल पैसा ही वजह नहीं थी बल्कि मृत्युंजय (पूरा गिरोह ) चाहते थे कि समाज के सभी संपन्न लोगों के लिए ये एक सबक बने और उनका नाजायज़ दबाव समाज से कम हो जाये। इतनी लूट के बावजूद भी मृत्युंजय के किसी भी सदस्य ने किसी भी इंसान को मारा नहीं था। हत्या उनके नियमों के विरुद्ध थी।


(तीसरा अध्याय)

हालात

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साल 1980

     अब बारी थी, तीसरे अध्याय की - हालात। ये एक ऐसा शब्द है जिसके मायने सबके लिए अलग हैं। किसी के हालात अच्छे होते हैं किसी के बुरे और किसी के सामान्य। 
      पर एक और आयाम है इन हालातों का - दयनीय। निकुंज और बाकी सभी मृत्युंजय साथियों ने इन 2 सालों में बहुत सी लूट पाट की। इन सब हालातों के चलते प्रशासन को भी कदम उठाने पड़े। निकुंज जानता था कि अब प्रशासन उनपर शिकंजा कसेगा। पर वो सब बेखौफ थे। 
      एक दिन ज़ब निकुंज और उसके कुछ साथी नये साहूकारों की तलाश मे निकले तो रास्ते में उन्हें कुछ झुग्गियां नज़र आयी जिनमें से एक जलकर राख़ हो गयी थी और लोग उस झुग्गी के आसपास जमा थे। निकुंज ने वहा रुककर लोगों से पूछा-

निकुंज : यहां क्या हुआ है?

एक बुजुर्ग आदमी ने आगे बढ़कर कहा - यहां एक बार फिर गरीब के पेट की आग ने उसे और उसके पूरे परिवार को जला दिया।

निकुंज : मैं कुछ समझा नहीं।

बुजुर्ग : ये एक गरीब मजदूर का घर था जो अब नहीं रहा। उसके दिन - रात काम करने के बावजूद उसके घर मे पेट भर खाने तक को नहीं था तो उसने साहूकार से पैसे ब्याज पर लिए। कर्ज बढ़ता गया और उसके पैसे ना देने पर साहूकार और उसके  बेटे ने कल रात उस मजदूर को उसी के घर में परिवार के साथ आग लगा दी।

        ये बात सुनकर निकुंज का क्रोध हर सीमा को पार कर गया। अब ना उसका खुदपर काबू था ना आने वाले हालात पर।  निकुंज अपने पूरे मृत्युंजय गिरोह के साथ साहूकार के घर गया और उसका घर लूटकर साहूकार और उसके बेटे को घर समेत आग लगादी। 

        यह पहली बार था कि मृत्युंजय गिरोह ने अपना नियम तोड़ा था। निकुंज कभी किसी को मारना नहीं चाहता था पर एक बार फिर हालात ने उसे वो करने पर मजबूर किया, जो वो कभी ना करता। लगी आग को देख कर निकुंज के मन मे ख्याल आया - 


जलकर हुआ है रखा जिसने आग को जलाया था।

साथ कुछ ना ले जा सका जो लूट लोगों को कमाया था।

तोड़ दिया हर नियम मैंने तोड़ी आज जो कसमें है।

जाने क्यों खुदको मैंने मृत्युंजय बनाया था।।


        कहीं ना कहीं निकुंज को अफ़सोस था कि जो नियम खुद उसने बनाया था, आज उसी ने तोड़ दिया और उसे डर था की इसका परिणाम जाने किन हालातों को जन्म देगा। निकुंज और उसका गिरोह फिर उसी बस्ती में गए और जो कुछ साहूकार से लूटा था उसे लोगो मे बाँट दिया।
       आज तक मृत्युंजय ने सिर्फ लोगों को लूटा था पर किसी की हत्या नहीं की थी। ये पहली बार था और हत्या भी कोई आम नहीं प्रशासन ने इसे नरसंहार कहा। 
       मृत्युंजय ये नहीं जानते थे कि जिस साहूकार को उन्होंने जलाया उसका जमाई मंत्री था। इस कांड के बाद इलाके में प्रशासन द्वारा कई लोगो को मौत की घाट उतार दिया गया। कई लोगों के मकान मंत्री के सहयोगियों ने फूँक दिए। गरीबो के साथ तरह तरह के अत्याचार हुए।हालात बहुत बदतर थे। 

       निकुंज और उसका गिरोह कहीं अब आ जा नहीं पा रहे थे।क्योंकि इलाके में उनके खिलाफ दिखते ही गोली मारने के ऑर्डर जारी हो गए थे। निकुंज और उसके गिरोह ने जो कुछ भी लूटा था उसका बड़ा हिस्सा उन्होंने उन लोगो की मदद के लिए दे दिया जिनका इस सब में नुकसान हुआ। अब उनके पास ज्यादा कुछ बचा नहीं था। धीरे धीरे राशन रसद सब खत्म होने लगा और मजबुरी यह थी कि ना तो अब वे बाहर निकल सकते थे और ना ही कहीं से मदद मिल पा रही थी । क्योंकि लोग समझने लगे थे की जो कुछ उनके साथ हो रहा है उसका कारण मृत्युंजय ही है।

      वह पहली बार था ज़ब निकुंज को एहसास हुआ कि उसने जो रास्ता चुना वो उसके हालात ने उससे चुनवाया था पर ये रास्ता अगर गलत नहीं है तो सही भी नहीं है। क्योंकि उनकी वजह से बहुत से लोगों के घर उजड़ गए। कई लोग मारे गए। और अब उनके हालात भी खराब है। धीरे धीरे मामला दबने लगा। इससे पहले मामला पूरी तरह से दबता निकुंज और उसके गिरोह के सभी तरह के रसद राशन खाने पीने का सामान खत्म हो गया। 

     तभी निकुंज को पता चला कि एक पूरे गांव को किसी गिरोह ने लूट कर आग लगा दी और उन्होंने खुदको मृत्युंजय बताया है। ये सुनकर निकुंज पूरी तरह बौखला गया। अब लोगों के बीच भी जिन्हें मसीहा समझा जाता था, उन्हें लुटेरे, राक्षस, डाकू कहा जाने लगा।

      जिस समाज को निकुंज बदलना चाहता था, उन्हें इंसानियत सिखाना चाहता था वे उसे राक्षस समझने लगे थे। लोगो के बीच उन्हें लेकर रोष पैदा होने लगा।


जाने रास्ते गलत है या गलत हैं हम।

किस्मत की कमी या कहीं हम थे कम।

जाने क्यूं अब रास्ता बदलने को मन करता है।

जाने कब आये हथियार इन हाथों में जिनमें कभी थी कलम।।

     

       हालात बदलते देर नहीं लगती। निकुंज ने अमीरों को लूटा गरीबों की मदद भी की। समाज को बदलने की कोशिश करना चाहता था वो पर आज समाज ही उसके खिलाफ है। जिन कामों से वो कुछ लोगों का देवता बना था , उन्हीं कामों को उसके खिलाफ इस्तेमाल करके उसे राक्षस बना दिया गया। हालात उसे कहां से कहां ले आये। एक मासूम बच्चे से एक सीधा आदमी और फिर एक मजबूर इंसान और फिर एक अपराधी। 

     पर वो आज भी यही मानता था कि जो कुछ हुआ उसका जिम्मेदार जितना वो था उतना ही इस समाज के ताकतवर लोग भी थे। लोगों में खत्म हो रही इंसानियत ने उसे ऐसा बनने पर मजबूर किया।



अंतिम अध्याय हकीकत

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        धीरे धीरे आम लोगों के साथ लूट और हत्याओं की घटनाएं बढ़ने लगी और हर कोई इसका इल्जाम मृत्युंजय गिरोह पर ही लगा रहा था। निकुंज और उसका गिरोह इस बात से परेशान थे और वो इसका समाधान ढूंढना चाहते थे। उसके सभी साथी अलग अलग राये दे रहे थे किसी ने कहा कि हम कहीं और जाकर आम जिंदगी जीते हैं। किसी ने कहा कि हम उन और गिरोह से निपटते हैं जो हमारा नाम लेकर ये कर रहे है।

       पर निकुंज चुप था। उसे लगा लड़ना या भाग जाना सबसे आसान काम है इस हालात में । पर मुश्किल है सामना करना। सामना करना सचाई का। वो समाज के विरुद्ध ज़रुर था पर उसने कभी समाज का ( आम / सामन्य ) लोगों का बुरा करने की भावना या इच्छा कभी नहीं की। पर अब ज़ब समाज को उसके नाम से दिक्क़तो का सामना करना पड़ रहा है तो उसे इस बात का सामना करना होगा। निकुंज ने अपने साथियो से कहा

निकुंज :- हम लोगो के बीच जायेंगे और उन्हें सच बतायेंगे।

सम्राट (साथी ):- लेकिन इसकी क्या ज़रूरत है, ऐसे तो हमारी दहशत ख़त्म हो जाएगी।

निकुंज : हमें ये दहशत समाज के गलत और अमीर लोगों के बीच फैलानी थी ना कि आम और गरीब जनता के बीच। वो सब हमारे जैसे ही है । समाज के कुछ अमीर और गलत लोगों के गुमराह किये और सताए लोग हैं। और उनका हमें सामना करना ही होगा।

    बाकी सब को भी निकुंज पर विश्वास था। उन्होंने फैसला किया की कल वे लोग वहीं जायेंगे , जहाँ से ये सब शुरू हुआ। उसी बस्ती के लोगों से मिलकर वो सच्चाई बताएंगे। अगले दिन मृत्युंजय गिरोह उस बस्ती मे पहुंचा। उन्हें देख कर लोग डर के मारे घरों मे छुप गए। 

      निकुंज ने आगे बढ़कर ज़ोर से कहा - डरने की ज़रूरत नहीं है । हम यहां कुछ लूटने नहीं आये बल्कि एक सच बताने आये है। आस पास के इलाके मे जो कुछ भी हो रहा है वो हम नहीं कर रहे बल्कि ये हमारे खिलाफ साजिश है।

      लोगों को इस बात पर यकीन नहीं था, पर उनके मन मे उन्हें लेकर रोष था। वो किसी भी तरह इस गिरोह से छुटकारा चाहते थे। लोगों ने अपने घर से बाहर निकलकर उनसे तरह तरह के सवाल किये। निकुंज ने हर सवाल का जवाब भी दिया। फिर लोगो ने एक तरफ जाकर बात की और बस्ती के मुखिया ने निकुंज से कहा कि हम आपकी बातो से सहमत हैं। और हम ये मानते है जो कुछ भी हुआ उसमे आपका हाथ नहीं है। हम आपसे माफ़ी मांगते है। 

      फिर मुखिया ने कहा - आप सब बस्ती की चौपाल में चलिए । वहां हम आपके खाने पीने का प्रबंध करना चाहते है। निकुंज और उसके साथियो ने कई दिनों से कुछ नहीं खाया था। तो वो भी मान गए। 

      गाँव के लोगो ने उनके लिए खाने का प्रबंध किया और उन्हें खाना खिलाया। खाना खाते समय निकुंज के सभी साथी एक एक करके बेहोश होने लगे और इससे पहले निकुंज कुछ समझ पाता वो भी बेहोश हो गया। कुछ समय बाद ज़ब उसे होश आया तो उसने देखा कि वे सब एक पेड़ से बंधे हुए थे। 

     निकुंज ने मुखिया से पूछा - ये सब क्या है? तब मुखिया ने कहा - माना कि सभी घटनाओं में तुम्हारा हाथ नहीं था पर समाज को इस हालात के सामने खड़ा करने वाले तो तुम ही हो। पहला कांड तो तुमने ही किया था। 

      निकुंज कुछ बोल पाता, उससे पहले उसे और उसके साथियो को ग़ीला कर दिया गया। तब उन्हें समझ आया कि उनके ऊपर जो पड़ा है वो मिट्टी का तेल है और फिर पूरी बस्ती ने मिलकर निकुंज और पूरे मृत्युंजय गिरोह को आग लगादी।          आग के लगते ही निकुंज ने आस - पास खड़े सभी लोगों को देखा और मुस्कुराया और सोचने लगा, उसे लगता था कि शायद और लोग भी इस एक तरह क़ी जिंदगी और गुलामी से परेशान हैं पर वो गलत था। 

       गुलामी तो समाज( सभी लोग चाहे,कोई भी )ने खुद मंजूर क़ी है। और जो इसे मंजूर ना करे वो विरुद्ध कहलाया और विरुद्ध क़ी अंतिम मंज़िल ऐसी मौत होती है। समाज ना तो किसी को अलग तरह से जीने देना चाहता ना वो खुद इस गुलामी को छोड़ना चाहते हैं।और ना किसी और को इसे छोड़ने पर बर्दाश्त करते हैं।

      निकुंज को मुस्कुराता देख कर लोग चौंक गए कि मरते समय भी ये इंसान मुस्कुरा रहा है। निकुंज ने अपनी जिंदगी के आखिरी पलों मे अपनी पूरी जिंदगी को याद किया और उसके मन मे एक आखिरी ख्याल आया।


खुदको ज़िंदा समझते हैं पर ज़िंदा ये नहीं हैं,

अगर यही सच में जीना है, तो मर जाना ही सही है,

क्यों मजबूर हैं खुदसे इतने क्यों हर पल शर्मिंदा है,

आत्मा कब की मर गयी बस कहने को ही ज़िंदा हैं,

हर रोज़ खुदकी लाश उठा कंधे पर निकल जाते हैं,

दुनिया की बेमतलब ज़िद मे जल कर पिघल जाते हैं,

क्यों कोई आवाज नहीं उठता क्यों सब बेज़ुबान हैं,

बस कुछ लोगों के गुलाम हो और इसी का उन्हें गुमान है,

हर बार हर किसी को यही सहना पड़ता है,

जो दुनिया सिखाए बस वही कहना पड़ता है,

जो ना माने इन बंधनों  को बागी वो कहलाया है,

इसी तरह इस दुनिया ने धोके से उसे जलाया है,

क्यों ये नहीं चाहते बदलाव आखिर क्या बुराई है,

जीना तो उसने भी ना सिखाया जिसने दुनिया बनाई है,

क्यों खुदको समझे ये खुदा, ये किसी के खुदा नहीं है,

अगर यही सच में जीना है तो मर जाना ही सही है।।



     यही ख्याल निकुंज की आखिरी सांस तक चला उसके मन में। और देखते ही देखते वो राख हो गया। लोग ख़ुशी से झूमने लगे उन्हें ऐसा महसूस हुआ कि उन्होंने कोई बहुत बड़ा काम कर दिया। 

      फिर सब लोग एक बार दोबारा उसी तरह जीने लगे जैसे वो पहले जीते थे। फिर वही पैसे की तलाश मे दौड़ते रहना, फिर वही दूसरों की गुलामी सहना, फिर वही नाइंसाफी और बर्बरता बर्दाश्त करना, और फिर खुदके मन को मार कर अपनी आत्मा को मारकर बस जिन्दा रहना।


सार

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     कहानी का सार समझा जाये तो बस यही है कि दुनिया में लोग अनचाहे, अनजाने, बिना किसी सवाल के एक ही तरह की जिंदगी जीते रहते है। सबको उसी दौड़ मे दौड़ना पड़ता है। और जो सवाल करता है जो इसे समझना चाहता है जो इसके विरुद्ध होना चाहता है उसे ये समाज नकार देता है। उसे कमज़ोर नाफरमान, अड़ियल, बेवकुफ़ सझकर समाज दुत्कार देता है।         फिर उससे उम्मीद क़ी जाती है कि वो किसी कमजोर इंसान की तरह थक हार कर या तो गुलामी मंज़ूर करेगा या भूखा प्यासा मर जायेगा। 

     निकुंज को लुटेरा बनने पर मन, दुनिया, हालात और हकीकत इन्हीं चीजों ने मजबूर किया। उसे उचित सम्मान और इंसानियत की तलाश थी जो उसे इस दुनिया से नहीं मिला।             आज कल के अपराधियों को अगर समझा जाये तो 80%अपराधी के अपराध के पीछे इन्हीं 4चीजों में से एक होंगी। ज़ब एक कमज़ोर इंसान दुनिया के तौर तरीको को नहीं अपना पाता और बेगैरत की मौत भी नहीं मरना चाहता तो वो अपराधी बनता है। 

      इस कहानी का मकसद किसी अपराध या अपराधी को समर्थन देना नहीं बल्कि खुदके अंदर झाँकना है कि क्या हम लोगों के साथ सही व्यवहार करते हैं? क्या हम लोगों को समझने क़ी कोशिश करते है? क्या हम किसी को मजबूर करते हैं? इन सवालों का जवाब हम खुदको कभी देना भी नहीं चाहते। क्योंकि सच का सामना करने पर सबको जल जाने का डर होता है।


खुदको कर मजबूर मजबूत कहे जा रहे हो,

जाने क्यों इस भ्रम मे बेवजह रहे जा रहे हो,

खुदसे पूछो अकेले में सवाल ये कभी,

दुनिया तुम्हें सह रही है या तुम दुनिया को सहे जा रहे हो।।


(स्वरचित)

- निशिकांत देवर्थ

287 सेक्टर 19, 
उद्योयोग विहार, गुड़गांव ।

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विविध - अभिव्यक्ति
February 20, 2022
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