Skip to main content

जलेबी Jalebi - A Hindi short - story


 जलेबी 

      स्कूल से आती परेड एवं देशभक्ति गीतों की सुरीली आवाजें कुसुम को घर में भी साफ़ - साफ़ सुनायी दे रही थी |
      वह 15 अगस्त, स्वतंत्रता-दिवस का दिन था |बिल्कुल पास में ही स्कूल था|कुसुम एक गृहिणी है उसका एक बेटा है - शुभम, जो लगभग 4 वर्ष का है |
      सुबह उठते ही शुभम स्कूल के लिए तैयार होने की जिद कर समय से पहले ही तैयार होकर बैठ गया |
      आखिरकार, कुसुम ने खुदको जल्दी से तैयार किया और शुभम को स्कूल छोड़ आयी |
       कुसुम का घर सड़क के एक ओर था तो दूसरी ओर स्कूल था |करीब 200 मीटर की दूरी होगी ¦कुसुम स्कूल पास होने के कारण खुश थी कि वह बच्चे को स्कूल छोड़ने ले जाने में कम समय लगता |
      लेकिन हाईवे के कारण सड़क पर चलने वाली गाड़ियों की लाइन लगी रहती तथा आए दिन कोई न कोई दुर्घटना भी होती रहती|
       शुभम के स्कूल जाने के बाद कुसुम घर के कामों को निपटाने लगी| झंडोत्तोलन के बाद शुभम के स्कूल में कुछ प्रोग्राम  होने वाले थे, उसके बाद छुट्टी|
      दिन के 11:00 बज चुके थे कुसुम घर के सभी काम निपटा कर शुभम के स्कूल जाने की तैयारी करने लगी तभी उसे बाहर कैंपस के गेट के खुलने की आवाज आई|
     मन ही मन कुसुम ने अंदाजा लगाया जरूर पड़ोस की सविता आई होगी, थोड़ी झुंझलाहट हुई कि इस वक्त ना चाह कर भी कुछ देर तो अवश्य ही गप करेगी तथा साथ ही साथ बेवजह उसे स्कूल जाने में देर होगी| बातूनी पड़ोसन जो मिली थी उसे| पर दिल की अच्छी थी, उसने मन ही मन सोचा|
       इसी उधेड़बुन में कुसुम कमरे से बाहर निकल आई| सामने उसने देखा तो वह सविता नहीं बल्कि शुभम था |वह भी अकेला |जल्दी से कुसुम उसके पास गई और गेट के आसपास देखते हुए पूछी, - "किसने तुम्हें यहां तक छोड़ा?"
      "मैं खुद आया हूँ मम्मी|" - शुभम ने जवाब दिया|
       यह सुनते ही कुसुम का कलेजा मुंह को आ गया| उसने झट से शुभम को गोद में उठाया और कमरे के अंदर ले गई|
        शुभम के नन्हे हाथों में एक पत्ते के दोने में दो जलेबी रखे हुए थे| जिसे उसने बड़े जतन से अब तक पकड़े हुए था|शायद स्कूल में बच्चों को बांटा गया था स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर|
        उसने कुसुम की ओर उस दोने को बढ़ाते हुए कहा, - "मम्मी मुझे यह  खिला दीजिए, मैंने नहीं खाया है|"
       कुसुम ने एक टुकड़ा जलेबी का शुभम के मुंह में डाला तो शुभम ने कहा, - "मम्मी आप भी खाइए|"
       उसकी इस मासूमियत से कुसुम एकटक उसे देखने लगी| पहली बार उसका दिल घबराया| सौ सवाल उसके दिमाग में कौंध गए |
      " किसने शुभम को सड़क पार कराया होगा?"
      "क्या खुद से सड़क पार किया शुभम ने?"- वह भी दोने में दो जलेबी दोनों हाथों से पकड़े हुए?
       अगर कुछ अनहोनी हो जाती तो!!
    इन सारे सवालों ने कुसुम को अंदर तक हिला कर रख दिया| उसका ह्रदय कांप गया
      आज कई वर्ष गुजर चुके हैं इस घटना के| फिर भी कुसुम का दिल घबरा जाता इसे याद करके |शायद किसी अनहोनी के घटित होने के डर से जो उस वक्त नहीं हुआ था|
      उस दिन कुसुम ना शुभम को डांट पाई थी ना ही कुछ बोल पाई थी, सिवाय इसके कि कभी घर अकेला ना आना |कुसुम मन ही मन ईश्वर को आज भी धन्यवाद देती है|

   (स्वरचित)
:- तारा कुमारी
       

 Short-stories ,You may like also..

 1. डायरी 
  2. तमन्ना

Comments

Popular posts from this blog

ना देख सका वो पीर Na dekh saka wo pir - Hindi poem

दिल मेरा यूँ छलनी हुआ Dil Mera yun chhalni huwa - Hindi poem

मैं हूँ कि नहीं? Main Hun ki nahin? - Hindi-poem

फादर्स - डे Father's day - A Hindi poem

चाहत Chahat -Hindi poem