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थोड़ा और की चाह Thoda aur ki chah - Hindi poem

थोड़ा और की चाह ( हिंदी कविता)/ Thoda aur ki chah(Hindi Poem) ( कभी कभी हम उन खुशियों को नहीं देख पाते या उनकी कद्र नहीं करते जो हमारे आस पास  होती हैं।हमें ज्यादा की चाह इतनी हो जाती है कि कुछ भी करने के लिए तैयार हो जाते हैं चाहे वो रास्ता गलत ही क्यूं ना हो, जो बाद में हमें सिर्फ बदले में दुख देती है। जीवन में सुख दुख आते रहते हैं। हमें उनका समान रूप से स्वागत करना चाहिए और अडिग होकर अपना कर्तव्य निभाना चाहिए।जो कमजोर हो जाते हैं वो सब कुछ खो देते हैं।) इन्हीं भावनाओं को उकेरती ये कविता प्रस्तुत है:-   थोड़ा और की चाह थोड़ा और की चाह में  जो पास है वो मत गवाना, अथाह खुशियों की चाह में कहीं गमों को ना समेट लेना। छोटी छोटी खुशियां भी जिंदगी में रंग भर देती हैं, थोड़ा और की जिद, इसमें कड़वाहट घोल देती है। जैसे दिन के बाद रात आती है खुशियां भी अपना रंग बदलती है, कभी उदासी कभी आंसू बनकर जीवन के रंगमंच में भूमिका निभाती है। थोड़ा सब्र कर जिंदगी के टेढ़े मोड़ पर कर ले हर पल की तू  बंदगी, तपकर तू बनेगा एक दिन सोना विकल होकर खुदको मत खोना। रास्ते में नहीं बिछे होंगे फूल सदा कांटे भी मिलेंगे
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वक़्त के सीने में Waqt ke seene mein

  वक़्त के सीने में (हिंदी कविता)/Waqt ke seene mein (Hindi poem) (कालचक्र ने हमेशा ही संसार को नये नये दौर दिखाए हैं। इन परिस्थितियों में हम सब को हमेशा ही मिलकर भाई चारे का भाव लिए कठिन समय का सामना करने की आवश्यकता रही है।चाहे वह कोई प्राकृतिक आपदा हो या युद्ध जैसे विनाशकारी संकट हो।आज हम जिस समसामयिक संकट से जूझ रहे हैं उससे ओतप्रोत छोटी सी कविता प्रस्तुत है:-) वक़्त के सीने में हम बांधते हैं वक़्त को एक पैमाने में कभी साल कभी दिन कभी महीने में कई दौर गुजर जाते हैं वक़्त के सीने में हम उलझे रहते हैं जन्म-मृत्यु के जाल में नहीं मज़ा  है बेमतलब सुख चैन खोने में क्यूं इंसान खुश नहीं है एक साथ होने में दिन रात बिता देते है दूसरों को तौलने में खुद भले ही हों बदनाम  पूरे महकमे में दुनिया को दिखाया है भविष्य,वक़्त ने आइने में खड़ा है तू विकराल मुंह खोले मौत के दरवाजे में कुछ ही फासला होता है जान गवाने में अरसे निकल जाते हैं गुजर बसर जुटाने में जान हलक में रख बीती है 2020 कोविद-19 में दो हजार इक्कीस थोड़ी मिसरी घोल जाए जीवन में आओ जगा कर प्रेम भाव अपने मन के कोने में  लग जायें हम सब प्रकृत

कश्मकश kashmakash - Hindi poem

कश्मकश / Kashmakash - हिंदी कविता(Hindi poem) (जिनके बारे हमें लगता है कि वो हमारा दर्द नहीं समझ सकते, हम उन्हें नजरअंदाज करते हैं। लेकिन हो सकता है वो उसी दर्द से गुजर रहे हों और उन्होंने कभी जताया ना हो।ऐसे में जब हम उन्हें ' तुम नहीं समझोगे ' जैसी बातें  कहकर और दर्द दे जाते हैं तो वो चुपचाप सहना ही बेहतर मान लेते हैं। और हमें इस बात का एहसास तक नहीं हो पाता।) क्या आपने ऐसे परिस्थितियों का कभी सामना किया है?कुछ ऐसे ही आंतरिक संघर्षों और भावनाओं से ओतप्रोत ये छोटी सी कविता आपके समक्ष प्रस्तुत है:- कश्मकश एक कश्मकश इधर है  एक कश्मकश उधर है। उसने तो अपने टूटते घरौंदे  दिखा दिए हम ना दिखा सके अपना टूटता हुआ वजूद। जमाने के मखौल से छिपा रखा है अब तक वरना घरौंदा तो टूटा हुआ हमारा भी है। और वो सोचते हैं कि हमें अंदाजा ही नहीं  घरौंदे के टूटने की कसक.. बरसों जिन हालातों को जीती आयी हूं उन्हीं में से चंद रोज गुजर कर वो हमें ही नासमझ और खुशनसीब कहते हैं। जिस दर्द में डूबी कश्ती का आईना हैं हम उसी पर सवार होकर नये सफर के अनुभव हमसे बांटते हैं वो। कहते है तुझे पता ही नहीं, इसलिए तुम समझत

मेरी मुहब्बत इतनी खूबसूरत ना थी Meri muhabbat itni khubsurat na thi - Hindi poem

  मेरी मुहब्बत इतनी खूबसूरत ना थी (हिंदी कविता)  Meri muhabbat itni khubsurat na thi - Hindi poem कहते हैं.. मुहब्बत दुनिया की सबसे खूबसूरत तोहफ़ा है।कोई कहता है .. मुहब्बत आग का दरिया है।किसी के लिए  हसीन दुनिया तो किसी के लिए बर्बादी का रास्ता।जितने लोग उतनी ही बातें उतने ही अनुभव। लेकिन जितनी भी बातें कर ले जमाने भर में लोग.. इस मुहब्बत के बिना बात पूरी होती ही नहीं।मुहब्बत के कई रंगों में से एक रंग को बयां करती चंद लाइनें आपके समक्ष प्रस्तुत है:- मेरी मुहब्बत इतनी खूबसूरत ना थी। मुझे नहीं आता था  दर्द सहना दौड़ी चली आती थी तुम्हारे पास मुझे नहीं आता था चोट छुपाना दिखा दिया करती थी हर उदासी प्यार के दो बोल और साथ हो हर पल इस एहसास को पाने की जिद करती थी और इस जिद में कई गलतियां  कर जाती थी.. मुझे पता है - मेरी मुहब्बत इतनी खूबसूरत ना थी, इसलिए तुमने दूरी बना ली मुझसे। दूसरों के लिए तुम्हारा वक़्त देना और मेरे लिए मजबूरियां गिनाना कतई ना भाता था मुझे रूठ के कर बैठती थी शिकायतें मनाने के बजाय बेरुखी दिखाते थे तुम मुझे नहीं आता था इसे बर्दाश्त करना बोल जाती थी  बुरा भला मैं तुम्हें.. म

कविता की छटा kavita ki chhata - Hindi poem

कविता की छटा (हिंदी कविता) kavita ki chhata (Hindi poem)   कविता क्या है?  इसका उत्तर सीमित नहीं हो सकता।यह वो रोशनी है जिसकी चमक अलग अलग रूपों में हम तक पहुंचती है।इसकी छटा को चंद शब्दों में कविता के रूप में ही  उकेरने की छोटी सी कोशिश करते हुए ये कविता आपके समक्ष प्रस्तुत है :- कविता की छटा - Hindi poem  मन के भावों को जो पंख दे दे    वो सशक्त अभिव्यक्ति की दुनिया है कविता। शब्दों की खूबसूरत धागे में गुंथी एक सुगंधित हार है कविता। खूबसूरत फूलों के बागों में परियों की कहानी है कविता। सूरज की खिलती धूप में नहाती चांद की चांदनी बनकर खिलखिलाती, मूक अमूक सब की भाषा बनकर शब्दों से जीवंत दृश्यों का सृजन करती है कविता। कवि की सतरंगी कल्पना बन कर कल्पना के विहंगम सैर कराती है कविता। कविता कभी सुकोमल, कभी मनभावन, कभी कवि के सुख - दुख को, कभी जनमानस के मर्म को ऊकेरती.. हृदय को है ये झकझोरती। प्रेम, दुख, क्रोध,वीरता और कभी प्रतिकार की संदेशा है कविता। कभी छंद कभी मुक्तक कभी दोहा बन कई विधाओं में, मन को शीतल करती है कविता। कभी वीर रस, कभी ओज रस में डुबकी लगाकर सम्पूर्ण समाज को राह दिखाती है कविता

वो तुम थे और मैं थी wo tum the aur main thi - Hindi poem

वो तुम थे और मैं थी। (हिंदी कविता) / Wo tum the aur main thi. (Hindi poem) ( मन के कुछ कोमल भावनाएं हमारे हृदय में इतनी गहरी बस जाती हैं कि जिंदगी के हर मोड़ पर हमारे साथ साथ चलती हैं। वक़्त बदल जाता है,लोग बदल जाते हैं और हम  चाहकर भी ना उनसे मुंह मोड़ पाते हैं ना भुला पाते हैं।बस कहीं किसी कोने में उन यादों को उम्रभर अपने सीने में संजोए रख लेते हैं।) वो तुम थे और मैं थी  पल पल मुझे याद करना बातें करने के बहाने तलाशना तुम भूल गए वो दिन! वो तुम थे और मैं थी.. मेरी धड़कनों में बसे हैं, अब भी वो दिन। मीठी मीठी बातों के मेले में खो जाना और सड़कों पर लंबे सफर पर निकल जाना तुम भूल गए वो दिन! वो तुम थे और मैं थी.. मेरी धड़कनों में बसे हैं, अब भी वो दिन। मुझे देखते ही गालों पर खुशी की लालिमा छा जाना तेरी पूरी दुनिया का सिर्फ मेरे ही इर्द गिर्द सिमट जाना तुम भूल गए वो दिन! वो तुम थे और मैं थी.. मेरी धड़कनों में बसे हैं, अब भी वो दिन। कहीं खो गए अब वो सारे लम्हें पास होकर भी कहीं गुम हो तुम  हुक सी उठती है सीने में, अजनबी नजरों से जब मुझे देखते हो तुम। मुझे अब भी याद आते हो तुम... हां, मुझे अब

रूठे बैठे हो क्यों? Ruthe baithe ho kyon? - Hindi poem

रूठे बैठे हो क्यों? (हिंदी कविता) Ruthe baithe ho kyon ? ( Hindi poem)  (हम अक्सर छोटी बड़ी बातों पर कई बार अपनों से या दोस्तों से नाराज़ होकर रूठ जाते हैं और उम्मीद करते हैं कि हमें मनाया जाए। जब लोग या हमारे अपने हमें मनाते हैं तो खुदको बहुत खास महसूस करते हुए हम उनसे और ज्यादा जुड़कर उनके करीब हो जाते हैं।ये हमें खुशी देती है।लेकिन यदि जिससे उम्मीद करते हैं कि वो हमें मनाए वो ही अगर हमें अनदेखा करे तो हम भावनात्मक रूप से अधिक घायल महसूस करते हैं। ऐसे में क्या किया जाए?जिससे हम खुश रह सकें।कुछ ऐसी ही भावनाएं समेटते हुए ये कविता प्रस्तुत है -  रूठे बैठे हो क्यों? रूठे बैठे हो क्यों? आंखें उदास हैं क्यों? किसी की राह ताक रहे हो क्या? अपना दिल जलाते हो क्यों? रूठा तब जाता है..  जब कोई  मनानेवाला हो। गर ना हो कोई मनाने वाला  तो फ़िक्र ना कर ऐ दोस्त बस रूठना छोड़ दे और तनिक भी गम ना मना इस बात का.. जीवन जी भर जीने का नाम है, अंधेरे कोने में छुपकर आंसू बहाने का नहीं। खुदको दे दो एक नया मोड़ मुश्किलों की तो लगी है होड़। मान ले तू , बस एक बात पते की हर तरफ हैं खुशियां तेरे लिए। गर गम मिल जाए

आज फिर आंखें बरस गईं। Aaj phir aankhen baras gayin. A Hindi poem

आज फिर आंखें बरस गईं।(हिंदी कविता) Aaj phir aankhen baras gayin.(hindi poem) आज फ़िर आंखें बरस गईं। आज फिर आंखें बरस गईं कुछ यूं, उनके लिए नैना तरस गई। पहुंच तो गया वो मेरी रूह तक पर, रूह की सिसकी ना पहुंची उस तक। छुपा था अंदर एक समंदर कहीं  बेचैन संवेगों से  विचलित होकर नैनों के प्यालों से छलक गई आज फिर आंखें बरस गईं। समेटती रही उम्र भर  कभी खुद को, कभी टूटे हृदय के चूरे को। जोड़ती रही छोटे - बड़े टुकड़ों को कभी हंस कर  कभी अश्रु धारा में  खुद को भिगोकर। उससे ये भी ना देखा गया टूटे तीखे नुकीले चूरे को कुछ यूं,  अपने हाथों में मसला उसने बची खुची निस्पंद अस्तित्व भी कराह गई मन तो बिखरा सा था ही, देह भी निष्प्राण हो गई। आज एक जिंदगी,  फिर से वीरान हो गई।   (स्वरचित) :- तारा कुमारी (निष्प्राण - उत्साहहीन,जड़ निस्पं द - स्तब्ध,स्थिर अस्तित्व - सत्ता,मौजूदगी वीरान - उजड़ा हुआ संवेग - सुख या दुख की भावना,घबराहट) ( कैसी लगी आपको यह कविता?जरूर बताएं। यदि पसंद आए या कोई सुझाव हो तो कमेंट में लिखे। आपके सुझाव का हार्दिक स्वागत है।) More poems you may like:- 1) बहती नदी - सी 2) सीख रही हूं मैं 3)

बहती नदी - सी Bahti nadi si - Hindi poem

  बहती नदी - सी (हिंदी कविता) Bahti nadi si - Hindi Poem बहती नदी - सी थी मै,शांत चित्त बहती नदी - सी  तलहटी में था कुछ जमा हुआ कुछ बर्फ - सा ,कुछ पत्थर - सा। शायद कुछ मरा हुआ.. कुछ अधमरा सा। छोड़ दिया था मैंने  हर आशा व निराशा। होंठो में मुस्कान लिए जीवन के जंग में उलझी  कभी सुलझी.. बस बहना सीख लिया था मैंने। जो लगी थी चोट कभी जो टूटा था हृदय कभी उन दरारों को सबसे छुपा लिया था कर्तव्यों की आड़ में। फिर एक दिन.. हवा के झोंके के संग ना जाने कहीं से आया एक मनभावन चंचल तितली था वो जरा प्यासा सा मनमोहक प्यारा सा। खुशबूओं और पुष्पों  की दुनिया छोड़ सारी असमानताओं और  बंधनों को तोड़ सहमकर बहती नदी को खुलकर बहना सीखा गया, अपने प्रेम की गरमी से  बर्फ क्या पत्थर भी पिघला गया। पाकर विश्वास हृदय से जोड़े नाते का सारी दबी अपेक्षाएं हुई फिर जीवंत लेकिन क्या पता था - होगा इसका भी एक दिन अंत! तितली को आयी अपनों की याद मुड़ चला बगिया की ओर सह ना सकी ये देख नदी ये बिछड़न ये एकाकीपन रोयी , गिड़गिड़ाई ..की मिन्नतें दर्द दुबारा ये सह न पाऊंगी सिसक सिसक कर उसे बतलाई। नहीं सुनना था उसे, नहीं सुन पाया वो। नह

... सीख रही हूं मैं। Sikh rahi hun main - Hindi poem

.... सीख रही हूं मैं। Sikh rahi hun main - A Hindi poem बदलाव या परिवर्तन जब भी हमारे जीवन में आते हैं हम दो अनुभूतियों में से गुजरते हैं - या तो खुशी या दुख की अनुभूति।किसी को खोने का दुख हो या  कभी जो जिंदगी हम बड़े मज़े में जी रहे होते हैं और उसमें हम आनंद अनुभव करते हैं यदि वह अचानक गुम हो जाए तो हम सहज ही उसे स्वीकार नहीं कर पाते ।ये परिस्थिति हमें दुख का अहसास दिलाती है।हम  सभी कभी ना कभी ऐसे हालातों का सामना अपने जीवन में जरुर करते हैं। कुछ ऐसे ही उद्वेलित करती भावनाओं से गुजरती मन की दशा को उकेरती ये कविता प्रस्तुत है..    ... सीख रही हूं मैं। बात बात पर रूठ जाना और मनाना फिर बड़े शिद्दत से एक दूजे को गले लगाना हो गई  हैं ये गुजरी बातें नश्तर बन कर चुभती हैं अब ये यादें उन जख्मों पर खुद ही मरहम लगाना सीख रही हूं मैं, चोट खाकर मुस्कुराना सीख रही हूं मैं। खनखनाती हंसी और बस बेफिक्र सी बातें उनके बिना ना होती थी दिन और रातें गुम हुए अब वो बचकानी हरकतें वो दीवानगी वो शरारतें हसरतों का दम घोंटना सीख रही हूं मैं, चोट खाकर मुस्कुराना सीख रही हूं मैं। वक़्त ने लिया कुछ यूं करवट  गम ने