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मातृत्व / Matritwa / Motherhood - A Hindi poem

मातृत्व /   Matritwa / Motherhood - A Hindi poem ( हिंदी कविता) / मातृत्व पर कविता



      मातृत्व

नन्हीं सी धड़कन जब
स्त्री के कोख में
धड़कनों के संग लय मिलाती है, 
वह क्षण स्त्री के लिए
मातृत्व का अनमोल प्रतीति होती है.. 
स्त्री स्वत: ही मां में परिवर्तित हो जाती है।

मां और अजन्मे बच्चे का
अटूट रिश्ता अंतिम सांस तक बंध जाता है,
सुकोमल रुई के फाहे सी संतानें जब
माता की गोद भर जाते हैं,
तब मां सिर्फ एक स्त्री नहीं..
मौत को मात देकर
स्वयं के अंश की जननी बन जाती है।

मां बच्चे के लिए हर दुख उठाती है
हर खुशियां उन पर निछावर करती है
जीवन की पहली शिक्षिका माता ही तो होती है
हर कठिनाइयों से पार पाने का मंत्र
बड़े प्यार से मां बच्चे को सिखलाती है।

मां की मातृत्व की व्याख्या नि:शब्द है,
जीवन की हर झंझावात की
पहरेदार मां ही तो होती है,
जीवन-मरण के चक्र में..
स्वर्ग भी मां और ईश्वर की किरदार भी मां होती है ।

(स्वरचित)
:- तारा कुमारी

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(कैसी लगी आपको यह कविता?जरूर बताएं। यदि पसंद आए तो मेरे उत्साहवर्धन हेतू अपना comments जरूर दें और
कोई सुझाव हो तो कमेंट में लिखे। आपके सुझाव का हार्दिक स्वागत है। ) 

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