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Showing posts from November, 2020

बहती नदी - सी Bahti nadi si - Hindi poem

  बहती नदी - सी (हिंदी कविता) Bahti nadi si - Hindi Poem बहती नदी - सी थी मै,शांत चित्त बहती नदी - सी  तलहटी में था कुछ जमा हुआ कुछ बर्फ - सा ,कुछ पत्थर - सा। शायद कुछ मरा हुआ.. कुछ अधमरा सा। छोड़ दिया था मैंने  हर आशा व निराशा। होंठो में मुस्कान लिए जीवन के जंग में उलझी  कभी सुलझी.. बस बहना सीख लिया था मैंने। जो लगी थी चोट कभी जो टूटा था हृदय कभी उन दरारों को सबसे छुपा लिया था कर्तव्यों की आड़ में। फिर एक दिन.. हवा के झोंके के संग ना जाने कहीं से आया एक मनभावन चंचल तितली था वो जरा प्यासा सा मनमोहक प्यारा सा। खुशबूओं और पुष्पों  की दुनिया छोड़ सारी असमानताओं और  बंधनों को तोड़ सहमकर बहती नदी को खुलकर बहना सीखा गया, अपने प्रेम की गरमी से  बर्फ क्या पत्थर भी पिघला गया। पाकर विश्वास हृदय से जोड़े नाते का सारी दबी अपेक्षाएं हुई फिर जीवंत लेकिन क्या पता था - होगा इसका भी एक दिन अंत! तितली को आयी अपनों की याद मुड़ चला बगिया की ओर सह ना सकी ये देख नदी ये बिछड़न ये एकाकीपन रोयी , गिड़गिड़ाई ..की मिन्नतें दर्द दुबारा ये सह न पाऊंगी सिसक सिसक कर उसे बतलाई। नहीं सुनना था उसे, नहीं सुन पाया वो। नह

... सीख रही हूं मैं। Sikh rahi hun main - Hindi poem

.... सीख रही हूं मैं। Sikh rahi hun main - A Hindi poem बदलाव या परिवर्तन जब भी हमारे जीवन में आते हैं हम दो अनुभूतियों में से गुजरते हैं - या तो खुशी या दुख की अनुभूति।किसी को खोने का दुख हो या  कभी जो जिंदगी हम बड़े मज़े में जी रहे होते हैं और उसमें हम आनंद अनुभव करते हैं यदि वह अचानक गुम हो जाए तो हम सहज ही उसे स्वीकार नहीं कर पाते ।ये परिस्थिति हमें दुख का अहसास दिलाती है।हम  सभी कभी ना कभी ऐसे हालातों का सामना अपने जीवन में जरुर करते हैं। कुछ ऐसे ही उद्वेलित करती भावनाओं से गुजरती मन की दशा को उकेरती ये कविता प्रस्तुत है..    ... सीख रही हूं मैं। बात बात पर रूठ जाना और मनाना फिर बड़े शिद्दत से एक दूजे को गले लगाना हो गई  हैं ये गुजरी बातें नश्तर बन कर चुभती हैं अब ये यादें उन जख्मों पर खुद ही मरहम लगाना सीख रही हूं मैं, चोट खाकर मुस्कुराना सीख रही हूं मैं। खनखनाती हंसी और बस बेफिक्र सी बातें उनके बिना ना होती थी दिन और रातें गुम हुए अब वो बचकानी हरकतें वो दीवानगी वो शरारतें हसरतों का दम घोंटना सीख रही हूं मैं, चोट खाकर मुस्कुराना सीख रही हूं मैं। वक़्त ने लिया कुछ यूं करवट  गम ने