Skip to main content

Posts

Showing posts from July, 2021

मुझे कोई मनाए Mujhe koi manaye - A Hindi poem

  मुझे कोई मनाए( हिंदी - कविता) / Mujhe koi manaye (Hindi - poem) ( बच्चों में बालसुलभ प्रवृति होती है - रूठना, फिर मान जाना। लेकिन जीवन के हर उम्र और पड़ाव में  हम रूठें और कोई हमें हर बार मना ले, ऐसा कम ही होता है। हम जीवन के कई सवालों  और  जवाबों के बीच उलझते हैं और सुलझते हैं। इन्हीं भावों से ओतप्रोत ये कविता आपके समक्ष प्रस्तुत है।) मुझे कोई मनाए/Mujhe koi manaye -  Hindi poem माथे पर छोटी - सी परवाह की एक लकीर लिए कांधे पर धीमें से अपनेपन का स्पर्श कर, गालों से फिसलते आंसू पोंछ - गले लगाए  ख्वाहिश थी रूठने पर मुझे कोई मनाए। नाराजगी में मैं अगर ताव भी दिखाऊं झूठ मूठ के गुस्से में झटक कर दूर हो जाऊं तब भी मुस्कुरा कर वो मेरे और पास आए खवाहिश थी रूठने पर मुझे कोई मनाए। ना हो जरूरत मुझे किन्हीं शब्दों की और बयां हो जाए कहानी...  नम आंखों से मेरे अरमानों की। कुछ इस तरह दुलार की बौछार हो जाए ख्वाहिश थी रूठने पर मुझे कोई मनाए। पर ये क्या बात हुई! चाशनी में डूबे शहर में मेरी रुसवाई हुई। संगदिल जमाने में,मेरे चंद तजुर्बों में बस एक ये ही नहीं था मेरी झोली में - रूठना छोड़ दो..  ना करो तुम

आहिस्ता - आहिस्ता Aahista - aahista - A Hindi poem

  आहिस्ता - आहिस्ता( हिंदी कविता) / Aahista - aahista ( Hindi poem) रिश्तों की खींचा तानी, भावनाओं के उठते गिरते लहरों के बीच थपेड़ों को सहते हुए जिंदगी में हम बहुत कुछ सीखते हैं,कुछ खोते हैं, कुछ पाते हैं।कुछ उम्मीदों से परे... तो कुछ सपनों से परे। यही जिंदगी है। आहिस्ता - आहिस्ता ( हिंदी कविता) चमकते चांद को आंगन में देख कुछ यूं उतावली हो गई बरसों घर में जलते दीये और बाती में जालसाजी हो गई। ना जाने कब, रौशनी की  उज्ज्वल चादर आहिस्ता आहिस्ता स्याह हो गई।। स्वार्थ और लालच में रिश्तों के बीज खोखली हो गई असली नकली चेहरों के बाज़ार में सच काली हो गई। ना जाने कब, विश्वास की निर्मल चादर आहिस्ता आहिस्ता मैली हो गई।। जगमगाते कागजी सितारे तूफान में भीग कर फीके हो गए जो ओझल थे कहीं धूल में,वो धुल कर मोती हो गए। ना जाने कब, ख्वाहिशों की रंगीन चादर आहिस्ता आहिस्ता बदरंग हो गई।। जिंदगी के सबक सीखते-सीखते खुद एक सबक बन गए लगते थे कभी सबको सही,अब बस भूल बन कर रह गए। ना जाने कब, अपनेपन की मुलायम चादर आहिस्ता आहिस्ता सख्त हो गई।। (स्वरचित) :- तारा कुमारी ( कैसी लगी आपको यह गीत/कविता?जरूर बताएं। यदि पस