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Showing posts from May, 2021

गर्मी,छाया,हवा पर कविता kah mukri kavya vidha - hindi poem

गर्मी,छाया,हवा पर कविता। ( काव्य विधा - कह मुकरी  ) (काव्य विधा - कह मुकरी) गर्मी,छाया,हवा पर कविता - hindi poem भोर होते ही तपने लगता जैसे रात की आग हो सुलगता देखो तो इसकी बेशर्मी! कौन सखि साजन? ना सखि गर्मी। बाहर निकलो घर से, तो लहर जाता बन्द कमरे में जैसे सब ठहर जाता चलो मिली तो थोड़ी नरमी कौन सखि साजन? ना सखि गर्मी। जब भी वो पास आए  पसीने से तन भीग जाए तरसा दे ठंडी हवा के लिए जुल्मी  कौन सखि साजन? ना सखि गर्मी। लस्सी,मिल्क शेक,आम का पन्ना खूब पिलाता सुबह शाम बन्ना पर फिर भी लगता वो बैरी कौन सखि साजन? ना सखि गर्मी। जब हो खूब घने पेड़ के नीचे  सूरज ना दिखता उसके पीछे संग अपने ठंडी हवा लाता वो साया कौन सखि साजन? ना सखि छाया। चांदनी रात में बिछा हो खटिया और समय के रथ से गुम हो जाए पहिया तब हौले से दबे पांव मुझे छूकर भागे मुवा कौन सखि साजन?ना सखि ठंडी मंद हवा। (स्वरचित) :- तारा कुमारी (कैसी लगी आपको यह कविता?जरूर बताएं। यदि पसंद आए या कोई सुझाव हो तो कमेंट में लिखे। आपके सुझाव का हार्दिक स्वागत है।) More poems you may like:- 1) बहती नदी - सी 1) मुड़कर ना देखना अब पीछे कभी 2) बे सिर पैर

मुड़ कर ना देखना अब पीछे कभी mudkar na dekhna ab pichhe kabhi - Hindi poem

मुड़ कर ना देखना अब पीछे कभी - हिंदी कविता / Mudkar na dekhna ab pichhe kabhi - Hindi poem (आगे बढ़ो - move on... आसानी से लोग ये शब्द कह जाते हैं लेकिन चाहे कोई भी परिस्थिति क्यूं ना हो ,उससे निकल कर आगे बढ़ना आसान कभी नहीं होता।एक कदम आगे बढ़ाओ तो चार कदम कई कारणों, भावनाओं ,परिस्थितियों के दबाव में पीछे की ओर वापस खींच जाते हैं।लेकिन जब वजह हमारे और सबके भले की बात हो ,आत्म - सम्मान की बात हो तो बेशक आगे बढ़ना ही बेहतर होता है।) मुड़ कर ना देखना अब पीछे कभी जो ना देख सके तुम्हारे आंखों में नमी क्यूं खलना,जीवन में उसकी कमी! जब वो है ही नहीं, ना आसमा ना तेरी जमीं। मुड़ कर ना देखना अब पीछे कभी।। सह लिया तुमने कई हृदय आघात मन को मिली है सिर्फ कुठाराघात नहीं है ये जीने का सलीका। मुड़ कर ना देखना अब पीछे कभी।। प्रेम को चुन कर खो दिया है तुमने खुदको  समेट कर आत्म - सम्मान को अब आंचल में खुद की बन जा और चल निकल बाकी के सफर में। हां..मुड़ कर ना देखना अब पीछे कभी जो ना देख सके तुम्हारे आंखों में नमी क्यूं खलना,जीवन में उसकी कमी! जब वो है ही नहीं, ना आसमा ना तेरी जमीं।। (स्वरचित) :- तारा कुमार