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Showing posts from June, 2020

अश्कों से रिश्ता Ashkon se rishta-a Hindi - poem

अश्कों से रिश्ता Ashkon se rishta - a Hindi - poem
  अश्कों से रिश्ता..  अश्कों से कैसा रिश्ता है मेरा? 
 हर बात पर मचल कर
 गालों को चूम लेती है ये ..
 बड़ी जिद्दी है ये अश्क
 रोकना चाहे जब पलकें
 छलकने से इन्हें..
 बनकर मोती  लुढ़क जाती
 पलकों को मात दे जाती है ये!

(स्वरचित)
 :-तारा कुमारी
More poems you may like:- 1. मैं हूँ कि नहीं
२. Father's -day
3. चाहत
४. खामोशी






मैं हूँ कि नहीं? Main Hun ki nahin? - Hindi-poem

मैं हूँ कि नहीं? Main hun ki nahin? Hindi -poem
मैं हूँ कि नहीं? मेरे सुबह सवेरे में तू , तेरे सलोने शाम में.. मैं हूँ कि नहीं?

मेरे मचलते जज्बातों में तू ,
तेरी बातों में.. मैं हूँ कि नहीं?

मेरी बेचैनी में तू ,
तेरे अमन-चैन में.. मैं हूँ कि नहीं?

मेरे बदहवास धड़कन में तू ,
तेरे तरतीब साँसों  में.. मैं हूँ कि नहीं?

मेरी निराशाओं में तू ,
तेरी आशाओं में..मैं हूँ कि नहीं?

मेरी शख्सियत में तू ,
तेरी परछाई में..मैं हूँ कि नहीं?

हर लम्हा सोचूँ मैं तुझे ,
तेरी सोच में ..  मैं हूँ कि नहीं?

मेरी खामोशी में तू ,
तेरी आवाज में .. मैं हूँ कि नहीं?

मेरी डूबती सांसों में तू ,
तेरी अठखेलियां करती जिंदगी में.. मैं हूँ कि नहीं?

(स्वरचित)
:-तारा कुमारी
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२. चाहत
३. खामोशी
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फादर्स - डे Father's day - A Hindi poem

फादर्स -डे Father's day - A Hindi poem
  फादर्स - डे माता है जननी,तो पिता है पहचान इनसे ही होती है जीवन की आन-बान
पिता है पुत्री का पहला सच्चा प्यार इनकी छत्र छाया में न होती कभी हार
पिता का विश्वास देता पुत्र को आत्मविश्वास हार में भी ये दे जाती है जीत की आस
प्यार का अनकहा सागर है पिता  बिना बोले ही समझते ये मन की बात

बचपन की नन्ही ऊँगलियों का सहारा है पिता हर तूफान  में कश्ती का किनारा है पिता

परिवार की हर सपनों में पंख लगाते हैं पिता सब कुछ खामोशी से सह जाते हैं पिता 
सैकड़ों झंझावत को खड़ा अकेले झेलते हैं पिता जीवन के हर कड़वे अनुभव को प्यार से बताते हैं पिता
कभी बेटी की विदाई में दिल से रोते हैं पिता फिर 'रखना खयाल बेटी का' हाथ जोड़कर विनती करते हैं पिता
बच्चों की जीत से चौड़ी हो जाती है पिता का सीना सब की इच्छा पूर्ण करना ही है उनका जीना 
कभी सुख-दुख का मेला है पिता  कभी हंसी ठिठोले तो कभी अनुशासन है पिता
है अभिमान तो कभी स्वभिमान है पिता कभी जमीं तो कभी आसमान है पिता सब फलते-फूलते हैं जिनकी छाँव में.. वो वृक्ष है पिता|
स्वरचित :-(तारा कुमारी) More poems you may like…

चाहत Chahat -Hindi poem

चाहत Chahat-A Hindi poem     चाहत Chahat - Hindi poem  कद्र करना उनकी दिल से  जो आपके गम में रोते हैं..  बहुत कम मिलते हैं ऐसे लोग  जो अपने दुःख में भी आपके दुःख को महसूस करते हैं। 
यूँ तो हजार ख्वाहिशें होती उनके भी दिल में  पर ना कोई जिद ना कोई माँग..  आपकी एक हँसी की खातिर  छुपा लेते नम आँखों को हँस कर पल में  । 
दिल ना दुखाना उनका  जो हर नाज़ व नखरों को उठाते हैं..  खुद रूठे हों तब भी वो  आपको रूठे देख मनाते हैं। 
नादान सा है दिल उनका  ना तोड़ देना उनका दिल अपनी अना में..  जो अपनी बचपना छोड़ आपके लिए  मुस्कुरा कर बड़प्पन दिखा जाते हैं। 
कद्र करना उनकी दिल से  जो आपके गम में रोते हैं..  बहुत कम मिलते हैं ऐसे लोग  जो अपने दुःख में भी आपके दुःख को महसूस करते हैं। 

(स्वरचित)  : तारा कुमारी  More poems you may like:-
1. खामोशी
2. कह कहाँ कुछ पाता वो
3. दोस्त और दोस्ती /मित्रता
4. ना देख सका वो पीर






खामोशी/Khamoshi/Silence - Hindi poem

ख़ामोशी khamoshi/Silence - Hindi poem

ख़ामोशी khamoshi - Hindi poem जब उम्मीदें टूट कर बिखरती हैं लफ्ज़ जुबां से गुम हो जाते हैं  ठहर सा जाता है वक्त सन्नाटा छा जाता है जब जुबां खामोश हो जाती हैं  खामोशी ही शोर मचाती है  सुन पाता वही इस शोर को  जिसने खामोशी ओढ़ी है  बेसबब नहीं होती ख़ामोशी  जब दर्द हद से गुज़र जाता है  हर राह बंद हो जाता है
बना मैं सबका साथी
ना कोई बना मेरा हमदर्द  रोकने के लाख मशक्कत के बाद भी  जब आँखों से आँसू लुढ़क ही जाते हैं  उँगलियाँ चुपके से उनको पोंछती तब ख़ामोशी ही बेह्तर लगती  जब कोई ना पहुँचे दुखती रग तक  तब ख़ुद को खुद ही समझाना होता है  ना उम्मीद रखो किसी से  दिल को ये बतलाना पड़ता है  ख़ामोशी ही तब हर मर्ज की दवा बन जाती  सुकून व मरहम ज़ख्म की बन जाती  ये सफर है तन्हा और तन्हाई का
साथी हैं खुद का खुद ही  बाकी तो सब सफर के मुसाफ़िर होते हैं
पल दो पल के साथी होते हैं..
बाकी तो सब सफर के मुसाफ़िर होते हैं
पल दो पल के साथी होते हैं..।
(स्वरचित)  :- तारा कुमारी  More poems you may like:-
1. "ना देख सका वो पीर " का प्रत्युत्तर
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"ना देख सका वो पीर" का प्रत्युत्तर/"Na dekh saka wo pir" ka pratiuttar/"कह कहाँ कुछ पाता वो".. Kah kahan kuchh paata wo - Hindi poem

"ना देख सका वो पीर" का प्रत्युत्तर.. "कह कहाँ कुछ पाता वो " मेरे एक साथी अंक आर्य जी ने मेरी रचना "ना देख सका वो पीर" के प्रत्युत्तर में बेहद खूबसूरती से कुछ पंक्तियाँ लिखी हैं जो मुझे बहुत अच्छी लगी। मैं उनकी सहमति पर उनकी रचना मेरे ब्लॉग में शेयर कर रही हूँ। आशा है, आप सभी को ये जरूर पसंद आएगी।
:- तारा कुमारी 
"ना देख सका वो पीर " का प्रत्युत्तर..  "कह कहाँ कुछ पाता वो.."  देखा उसने भी सब कुछ, पर कह कहाँ कुछ पाता वो...
रेगिस्ताँ में थी हीर खड़ी,
'चेनाब' कहाँ से लाता वो...

छोटी-मोटी कोई सड़क नहीं,
मीलों लंबी वो दूरी थी...
कैसे बतलाता हीर को अब,
राँझा की क्या 'मजबूरी' थी...

रूष्ट हो चुकी हीर ने अब
'कुछ सुनने से इनकार' किया,
लगी 'कोसने' राँझा को,
कि किस 'बैरी' से प्यार किया...

राँझा भी कहकर क्या करता,
दोषारोपण से 'आहत' था...
किस कारण दूरी वो आयी थी,
यह 'वैराग' किस कारण था...

- अंक आर्या

(तारा कुमारी 'जी' की रचना के उत्तर में एक छोटा सा फ़्रेश प्रत्योत्तर) �� �� ^_^ More poems …

दोस्त और दोस्ती/मित्रता Dost aur Dosti/Mitrata - Hindi Poem

दोस्त और दोस्ती /मित्रता - हिन्दी कविता  दोस्ती सभी रिश्तों में सबसे खूबसूरत रिश्ता होता है और उसे निभाने वाले उससे भी खूबसूरत लोग होते हैं। दोस्त और दोस्ती शब्द हमारे जेहन में आते ही कई बेशकीमती मीठी यादें तैरने लगती है.. है ना.. 
इन्हीं कई सुखद पलों को जीती ये कविता आपके समक्ष प्रस्तुत है..

दोस्त और दोस्ती /मित्रता Dost aur Dosti /Mitrata /friendship - Hindi poem
कुछ रिश्ते होते खून के  कुछ रिश्ते बन जाते दिल के  ना बंधते ये रिश्ते जाति - धर्म से  बस मन में समा जाते एक दूजे के कर्म से  ये रिश्ता है दोस्त और दोस्ती का  जो होता है सबसे ज़ुदा  ना कद देखती ना उम्र देखती  ना देखती ये रंग - रूप  बस मन मिले और
हो जाए अजनबी भी मीत  है दोस्ती की अनोखी रीत  दोस्त बन जाते कभी पड़ोसी  तो कभी कोई परदेशी  कभी दोस्त बन जाते  अनजान डगर के राही  दोस्ती की बुनियाद होती विश्वास पर  स्नेह पर, अपनत्व पर  जब सारे रिश्ते छूट जाते  तब भी साथ खड़े रहते ये  दुःख में हौसला देते हैं ये  सुख में संग मस्ती करते  गम को हँसते हँसते बाँट लेते ये  खुशियों को दूना कर देते
कहते हैं उनको गरीब
जिनका ना हो कोई मित्र
अनम…

ना देख सका वो पीर Na dekh saka wo pir - Hindi poem

ना देख सका वो पीर  उसने उतना ही समझा मुझको
जितना उसने जाना खुदको
उसकी बेरूखी ने बंधन तोड़ दिये दिल के
एक तरफ आसमाँ रोया टूट के
एक तरफ हम रोये फूट  के
देखा उसने आसमाँ की बारिश
देख सका ना आँखों का नीर
भीगा वो बरसात में झूमकर
मेरी आँखें रोई उसकी यादों को चूम कर
उसका तन भीगा पानी में
मेरा मन भीगा आंसुओं में
ना देख सका वो पीर
ना पोंछ सका वो नीर
उसने उतना ही समझा मुझे
जितना उसने जाना खुदको
उसने उतना ही देखा मुझको
जितना उसकी नजरों ने देखा मुझको..

(स्वरचित)
:-तारा कुमारी
More poems you may like :-1. मेरा दिल यूँ छलनी हुआ
2. बुरा नहीं हूँ मैं
3. जीवनसंगिनी
4. विरह वेदना







दिल मेरा यूँ छलनी हुआ Dil Mera yun chhalni huwa - Hindi poem

दिल मेरा यूँ छलनी हुआ  तेरे पहलू में आकर भी चैन ना मिला
तलाश थी राहत की
दिल के बोझ को तुझसे बांट कर
कम करने की
रोये हम तेरे बाजुओं में टूट कर
फिर भी दिल को आराम ना मिला
जो तेरे अंदर मेरे लिये शक़ से हम रुबरु हुए
सुकून ए दिल और कहीं ज्यादा गुम हुआ
ग़म के बोझ को सहा ना गया हमसे
दिल मेरा यूँ छलनी हुआ
जो टूट कर बिखरे ऐसे
कि दोबारा हमसे खुदको समेटा ना गया
ख्वाहिश थी चमन में खुशबू बन कर महकने की
सौ टुकड़ों में बांट कर बिखेरा गया..

(स्वरचित)
:-तारा कुमारी
More poems you may like :-1. बुरा नहीं हूँ मैं
2. जीवनसंगिनी
3. विरह वेदना
4. इन्तेजार




बुरा नहीं हूँ मैं। Bura nahi hun main-Hindi poem

बुरा नहीं हूँ मैं। Bura nahi hun main. - Hindi poem     दुनिया में कई तरह के लोग हैं.. कुछ लोग बेल की तरह होते हैं जो बाहर से तो कठोर होते हैं किन्तु अंदर से कोमल और मीठे होते हैं। उनके ऊपरी स्वभाव से लोग अक्सर ही धोखा खा जाते हैं और उन्हें बुरा समझ लेते हैं।     वहीँ कुछ लोग बेर की तरह होते हैं जो ऊपर से कोमल और मीठे होते हैं किन्तु अंदर से कठोर और सख्त।
इन्हीं भावनाओं से ओत-प्रोत ये कविता आप सब के समक्ष प्रस्तुत है -

बुरा नहीं हूँ मैं।  हाँ, मैं तीखा बोलता हूँ  सच बोलता हूँ  कड़वा बोलता हूँ  लेकिन, बुरा नहीं हूं मैं। 
दिखावे की मीठी बोली नहीं बोलता पीठ पीछे किसी की शिकायत नहीं करता मन में दबाकर कोई बैर भाव नहीं रखता कुंठित विचार नहीं पालता   हाँ, बुरा नहीं हूं मैं। 
किसी का बुरा नहीं चाहता किसी पर छुपकर वार नहीं करता  कभी ह्रदय छलनी हो जाए तो छुपकर अकेले रो लेता  सबकी मदद दिल से करता हाँ, बुरा नहीं हूं मैं। 
अपनी जिम्मेदारियों से बैर नहीं मुझे कर्म ही मेरी पहचान है छलावे के रिश्ते बनाना नहीं आता मुझे बुरे वक्त में साथ छोड़ना नहीं सीखा मैंने  हाँ, बुरा नहीं हूं मैं। 
मौकापरस्त दुनिय…

जीवनसंगिनी Jiwansangini - Hindi Poem

जीवनसंगिनी /पत्नी /Life partner - हिन्दी कविता     जीवन में एक रिश्ता बड़ा ही अनूठा होता है :- पति - पत्नी का रिश्ता। इस संबंध की डोर जितनी कोमल होती है, उतनी ही मजबूत भी। पति - पत्नी का संबंध तभी सार्थक होता है जब उनके बीच प्रेम सदा तरोताजा बनी रहे।     इन्हीं कोमल भावनाओं के साथ यह कविता प्रस्तुत है जिस में एक पति  ने अपनी जीवनसंगिनी के लिये अपने कोमल भावनाओं को अभिव्यक्त किया है। 

     जीवनसंगिनी  मेरी साँसे हो तुम  मेरी धड़कन हो तुम..  मेरी अर्धांगिनी,
मेरी जीवनसंगिनी।  मेरे जीवन का आधार हो,  सात जन्मों का प्यार हो।  माना कि थोड़ी अकड़ती हो तुम,  माना कि थोड़ी जिद्दी हो तुम।  पर तुम ही मेरा साज हो,  तुम ही मेरा नाज हो।  हर सुख दुख की साथी तुम,  मेरे लड़खड़ाते कदमों का सहारा तुम।  बिन तेरे मैं था अधूरा-सा,  करते हो तुम मुझे पूरा-सा।  तू मेरी आदत, तू मेरा संबल  तू मेरी मनमीत, तू मेरी गजल।  तेरे आने से खिला नन्हा पुष्प आंगन में,  है तुझसे अब अटूट रिश्ता जीवन में।  करता हूं मैं दिल से स्वीकार,  हाँ, तुझसे है बेइंतेहा प्यार।  मैं दीया और तू है बाती  है दुआ ये..  रहे सदा तू, मेरी ही जी…