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Showing posts from July, 2020

बादल Badal/Cloud - Hindi poem

बादल /Badal/Cloud - hindi poem (हिन्दी बाल - कविता)   क्या आपने कभी  नीले आसमान में बादलों को  अठखेलियां करते  देखा है?  बादलों को स्वच्छ नीले आसमान में देखना अभूतपूर्व होता है.. आइए, आज हम  आसमान में बिखरे  बादलों  को कविता के माध्यम से  करीब से देखें.. बादलों की कहानी कहती हुई प्रस्तुत है मेरी यह कविता...   बादल (बाल कविता) उमड़ते घुमड़ते श्वेत चमकीले बादल  संग है इसके नीले आसमान की चादर  ये छोटे बादल, बड़े बादल, सयाने बादल  कभी ये भालू कभी खरगोश की भांति दिखते  बच्चों के मन को ये खूब भाते जरा, इन बादलों की मस्ती तो देखो..  सूरज के संग खेलते ये आंख मिचौली  कभी नारंगी कभी पीत रंग से खेलते ये होली  कभी शांत-चित्त  बिछ जाते आसमान के बिछौने में  कभी खिसकते धीमे-धीमे हवा के मंद चाल में  कभी दूधिया बर्फ-सी पर्वतों के सदृश्य अटल दिखते  हरदम मुस्कुराते आसमान में ये अपनी सुंदरता की छटा बिखेरते  जब आ जाता वर्षा ऋतु..  आते ही ये अपना रंग बदल लेते श्वेत उज्जवल काया को छोड़कर  काला स्याह रूप धर लेते  बिजली रानी भी तब रह रहकर  चमक अपनी दिखाती बाद

सपनें Sapne - A Hindi poem (Motivational poem)

सपनें /Sapne - A Hindi poem (हिन्दी कविता)   हताशा और निराशा कभी भी आशाओं से बढ़कर नहीं होनी चाहिए। जीवन में हार को भी जीत में बदलने की प्रेरणा देती यह कविता आपके समक्ष प्रस्तुत है:-      सपनें कुछ सपने छूट जाते हैं  कुछ सपने टूट जाते हैं और कुछ सपने रूठ जाते हैं।  टूटे सपने घाव दे जाते हैं  जो छूट जाते हैं वो पूरे कब होते हैं  रूठे सपनों में छिपी आशाएं होती हैं  पर आस भी जब टूट जाए तो  ह्रदय में बस  खालीपन घर कर जाते हैं।  मायूस ना होना,  अगर ये लम्हे मिल जाएँ कभी।  सपने तो कुछ टूटेंगे ही  कुछ पूरे होंगे और कुछ रूठेंगे ही  जो मिल गया वह भी कम नहीं  जो ना मिला तो ठहरो नहीं..  हार-जीत तो जीवन की रीत है  धैर्य, साहस और आत्मजय ही मनमीत हैं।  टूटे सपनों को जोड़ना सीख ले जो  जीवन के सतरंगी जंग जीत ले वो कर दृढ़ निश्चय, पथ पर आगे बढ़ो  मुट्ठी में कर लो अपने लक्ष्य को  कर लो सपने पूरे, अपने मन की..। (स्वरचित)  :-तारा कुमारी More poems you may like :- 1. अनकहे किस्से 2. आऊँगा फिर 3. जीवनसंगिनी 4. खामोशी

अनकहे किस्से Ankahe kisse - Hindi poem

 अनकहे किस्से /Ankahe kisse - Hindi poem (हिन्दी कविता)   अनकहे किस्से..  बेपनाह प्यार है तुम्हारे लिए  लेकिन इस दिल में सिर्फ तुम ही नहीं,  प्यार के गीत गुनगुनाती हूं तुम्हारे लिए पर उनको भी सहेज कर रखती हूँ दिल में अपने।  अगर मायने रखते हो तुम मेरे जीवन में वो भी मुस्कुराते हैं मेरे अफ़साने में मेरी हंसी मेरी उदासी में  हो अगर तुम परछाई मेरी  उनके बिना मैं अधूरी हूँ  मेरी खुशी मेरे हर ग़म में।  माना कि मेरी बेइंतेहा चाहत हो तुम पर उनका भी मान ना होगा कभी कम माँ, जिसने मुझे जन्म दिया पिता, जिसने सर पर सदैव स्नेहिल हाथ रखा।  वो भाई-बहन जिसके अप्रतिम प्रेम ने मुझे हमेशा ही तृप्त किया।  वो दोस्त जो निस्वार्थ भाव से  मेरे सुख-दुख के साथी बनते रहे  नहीं जताते कभी कोई हक वो मुझ पर पर दिल में सदा ही बसते हैं वो मेरे।  प्रिय, हो तुम प्रियतम मेरे जो फूल खिलाए हमने मिलकर उसके भी नाम है मेरे ह्रदय का एक टुकड़ा  मेरी सत्ता को मिलकर पूरा करते हैं ये सारे।  बेशक,  जीवन के हमसफर हो तुम  मेरा तन मन ह्रदय तुम्हें समर्पित है पर सच

आऊँगा फिर Aaunga phir - Hindi poem

आऊँगा फिर... /Aaunga phir... A Hindi poem     प्रेम में डूबे अधीर मन को थोड़ी तसल्ली और धैर्य बंधाते हुए एक प्रियतम की अपनी प्रियतमा के लिए उभरे भावनाओं को उकेरती प्रस्तुत कविता...     आऊँगा फिर..  जो है तेरे मन में  वही मेरे मन में  न हो तु उदास  तू है हर पल मेरे पास  अभी उलझा हूँ जीवन की झंझावतों में  रखा हूँ सहेजकर तुझको हृदय-डिब्बी में  जरा निपट लूँ उलझनों से आऊँगा फिर नई उमंग से  करना इंतजार मेरा तू मैं जान हूँ तेरी,जान है मेरी तू  न हो कम विश्वास कभी हमारा चाहे जग हो जाए बैरी सारा इन फासलों का क्या है...  जब मेरे हर साँस हर क्षण में बसी सिर्फ तू ही तू है | (स्वरचित)  :-तारा  कुमारी  More poems you may like:- 1. प्रेम - तृष्णा 2. चाहत 3. किताब की व्यथा 4. फादर्स - डे

प्रेम - तृष्णा /Prem - Trishna - A Hindi - poem

प्रेम - तृष्णा / Prem - Trishna :- A Hindi-poem        प्रेम - तृष्णा शुष्क रेगिस्तान में  शीतल प्रेम की एक बूंद की चाह तपते अग्नि सी बंजर भूमि में  ओस-सी प्रेम की एक बूंद की चाह मृग तृष्णा सी प्रेम की तृष्णा भटकते छटपटाते मन के भाव आस देख दौड़ चला उस ओर पास जाकर कुछ ना मिला मिली तो बस तपती शब्दों की चुभन मन को दुखाती कड़वाहट की तपन बुझ ना पायी मन की तृष्णा कैसी है ये व्यथा कैसी ये घुटन पुष्प रूपी कोमल हृदय को निराशा और वेदना, और घेर आई प्रेम की चाह ये कहाँ ले आई? दर्द के समंदर में गोते लगाते रहे पर साहिल कभी नजर न आई..। :-स्वरचित (तारा कुमारी) More poems you may like also:- 1. मैं हूँ कि नहीं? 2. ना देख सका वो पीर 3. अश्कों से रिश्ता 4. आऊँगा फिर