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"ना देख सका वो पीर" का प्रत्युत्तर/"Na dekh saka wo pir" ka pratiuttar/"कह कहाँ कुछ पाता वो".. Kah kahan kuchh paata wo - Hindi poem

"ना देख सका वो पीर" का प्रत्युत्तर..

"कह कहाँ कुछ पाता वो "

मेरे एक साथी अंक आर्य जी ने मेरी रचना "ना देख सका वो पीर" के प्रत्युत्तर में बेहद खूबसूरती से कुछ पंक्तियाँ लिखी हैं जो मुझे बहुत अच्छी लगी। मैं उनकी सहमति पर उनकी रचना मेरे ब्लॉग में शेयर कर रही हूँ। आशा है, आप सभी को ये जरूर पसंद आएगी।
:- तारा कुमारी 

"ना देख सका वो पीर " का प्रत्युत्तर..

 "कह कहाँ कुछ पाता वो.." 

देखा उसने भी सब कुछ, पर
कह कहाँ कुछ पाता वो...
रेगिस्ताँ में थी हीर खड़ी,
'चेनाब' कहाँ से लाता वो...

छोटी-मोटी कोई सड़क नहीं,
मीलों लंबी वो दूरी थी...
कैसे बतलाता हीर को अब,
राँझा की क्या 'मजबूरी' थी...

रूष्ट हो चुकी हीर ने अब
'कुछ सुनने से इनकार' किया,
लगी 'कोसने' राँझा को,
कि किस 'बैरी' से प्यार किया...

राँझा भी कहकर क्या करता,
दोषारोपण से 'आहत' था...
किस कारण दूरी वो आयी थी,
यह 'वैराग' किस कारण था...

- अंक आर्या

(तारा कुमारी 'जी' की रचना के उत्तर में एक छोटा सा फ़्रेश प्रत्योत्तर) �� �� ^_^

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