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Showing posts from 2020

याद है ना तुम्हें Yaad hai na tumhen - A Hindi poem (हिंदी कविता)

याद है ना तुम्हें Yaad hai na tumhen- Hindi poem (हिंदी कविता)
याद है ना तुम्हें / Yaad hai na tumhen याद है ना तुम्हें.. पहली दफा, जब कलम मेरी बोली थी तुम पर शब्दों की कुछ लड़ियां मैंने पिरोई थी।
तुम्हारे गुजरे पलों में बेशक मैं नहीं थी तुम्हारे संग भविष्य की अपेक्षा भी नहीं थी हां,वर्तमान के कुछ चंद क्षण साझा करने की ख्वाहिश जरुर थी।
याद है ना तुम्हें.. पहली दफा, जब कलम मेरी बोली थी तुम पर शब्दों की कुछ लड़ियां मैंने पिरोई थी।
देखो, आज फिर उंगलियों ने मेरी कलम उठाई है कुछ अनसुनी भावनाओं को संग अपने समेट लाई है माना ,मेरे शब्दों ने आहत किया तुम्हें लेकिन क्या,असल भाव को पहचाना तुमने?
याद है ना तुम्हें.. पहली दफा, जब कलम मेरी बोली थी तुम पर शब्दों की कुछ लड़ियां मैंने पिरोई थी।
उलझ गए तुम निरर्थक शब्दों में पढ़ा नहीं जो लिखा है कोमल हृदय में चल दिए छोड़ उसे, तुम अपनी अना में बंधे थे हम तुम, जिस अनदेखे रिश्ते की डोर में
याद है ना तुम्हें.. पहली दफा, जब कलम मेरी बोली थी तुम पर शब्दों की कुछ लड़ियां मैंने पिरोई थी।
बीत गए कई बारिश के मौसम क्या धुले नहीं, जमे धूल मन के? है अर्जी मेरी चले…

धरा / धरती /Dhara/Dharti (Earth) - A Hindi poem

धरा / धरती /Dhara / dharti/Earth - A hindi poem( हिंदी कविता)
धरा/धरती /पृथ्वी पर कविता धरा,माता है हम इनकी संतान सर्वत्र हरियाली,है इसकी शान विविधता है इसकी पहचान।
माटी के हैं कई रंग वन और वन्य जीव हैं इनके अंग सदा ही प्रेम दिया है धरा ने मानव को पुलकित होती जैसे देख माता बच्चों को।
दात्री है धरा पर हमने है क्या दिया? सर्वदा ही उपभोग किया सुखों का कभी न समझा मर्म, धरा के दुखों का।
स्वार्थ में अंधे होकर हम वीरान कर रहे धरा को हरियाली है श्रृंगार इसका बना रहे बंजर इसको।
फैला कर प्रदूषण माता के मातृत्व का कर रहे हम दोहन वक़्त रहते हम संभल जाएं..
धरा रूपी माता को  निर्बाध वात्सल्य बरसाने दें, तभी विश्व में होगी खुशियाली समस्त जगत होगी स्वस्थ और निरोगी और  ये धरती भी होगी बलिहारी।
(स्वरचित) :- तारा कुमारी
(कैसी लगी आपको यह कविता?जरूर बताएं। यदि पसंद आए तो मेरे उत्साहवर्धन हेतू अपना आशीर्वाद दें।और कोई सुझाव हो तो कमेंट में लिखे आपके सुझाव का हार्दिक स्वागत है। ) 
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संकल्प / Sankapl / प्रतिज्ञा / Pratigya/इरादा / Irada/ (Determination) - A Hindi Poem

संकल्प/Sankalp/प्रतिज्ञा/ pratigya/ इरादा irada/ Determination - हिंदी कविता
संकल्प / प्रतिज्ञा / इरादा इरादा जो हो सर्वस्व कल्याणकारी जन-जन के हित में जो हो लाभकारी लाख रोड़े खड़े हो जाएं तो क्या दृढ़ निश्चय से कर लो मुट्ठी में दुनिया सारी।
ये जगत है फूल और कांटों की क्यारी संकल्प ना टूटे कभी रखो इनसे ऐसी यारी जीवन छोटी है तो क्या पक्के इरादों से खेलो अपनी पारी।
कर्तव्य पथ पर पदयात्रा रखो जारी कंधों पर हो चाहे जिम्मेदारी भारी कभी गर मुंह की खानी पड़ी तो क्या हार के बाद जीत होती है सबसे प्यारी।
(स्वरचित) :- तारा कुमारी
(संकल्प/प्रतिज्ञा/इरादा पर ये कविता - कैसी लगी आपको ?जरूर बताएं। यदि पसंद आए तो मेरे उत्साहवर्धन हेतू अपना आशीर्वाद दें।और कोई सुझाव हो तो कमेंट में लिखे आपके सुझाव का हार्दिक स्वागत है। ) 
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मातृत्व / Matritwa / Motherhood - A Hindi poem

मातृत्व /   Matritwa / Motherhood - A Hindi poem ( हिंदी कविता) / मातृत्व पर कविता
      मातृत्व पर कविता नन्हीं सी धड़कन जब स्त्री के कोख में धड़कनों के संग लय मिलाती है,  वह क्षण स्त्री के लिए मातृत्व का अनमोल प्रतीति होती है..  स्त्री स्वत: ही मां में परिवर्तित हो जाती है।
मां और अजन्मे बच्चे का अटूट रिश्ता अंतिम सांस तक बंध जाता है, सुकोमल रुई के फाहे सी संतानें जब माता की गोद भर जाते हैं, तब मां सिर्फ एक स्त्री नहीं.. मौत को मात देकर स्वयं के अंश की जननी बन जाती है।
मां बच्चे के लिए हर दुख उठाती है हर खुशियां उन पर निछावर करती है जीवन की पहली शिक्षिका माता ही तो होती है हर कठिनाइयों से पार पाने का मंत्र बड़े प्यार से मां बच्चे को सिखलाती है।
मां की मातृत्व की व्याख्या नि:शब्द है, जीवन की हर झंझावात की पहरेदार मां ही तो होती है, जीवन-मरण के चक्र में.. स्वर्ग भी मां और ईश्वर की किरदार भी मां होती है ।
(स्वरचित) :- तारा कुमारी More poems you may like:-1. बेटियां
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(कैसी लगी आपको यह कविता?जरूर बताएं। यदि पसंद आए तो मेरे उत्साहवर्धन हेतू अपना आशीर्…

बेटियाँ/ Betiyan / (Daughters) - A Hindi poem

बेटियाँ/ Betiyan / (Daughters) - A Hindi poem (हिंदी कविता)
        बेटियाँ /बेटी पर कवितारिश्तों की एक खूबसूरत एहसास होती हैं बेटियाँ घर की रौनक, उदासियों में खिलखिलाहट अंधियारे में उजियारा होती हैं बेटियाँ.. जीवन डगर की बेशकीमती सौगात होती हैं ये बेटियाँ।
निश्छल मन के भावों से ओतप्रोत चिलचिलाती धूप में भी शीतल छांव होती हैं बेटियाँ उम्र के हर पड़ाव में, हर सुख-दुख में, माता-पिता की परछाई होती हैं ये बेटियाँ।
जग कहे पराया धन बेटी को पर इंद्रधनुष के सात रंगों की तरह कभी मां, कभी बहन.. ना जाने कितने रिश्तों में बंध जाती हैं ये बेटियाँ।
जब हर रिश्ते साथ छोड़ जाते हैं तब पूर्ण समर्पण से अडिग साथ खड़ी रहती हैं ये  बेटियाँ मां की ममता में पली,पिता के गर्व में लिपटी स्वर्ग से उतरी परी होती हैं ये बेटियाँ।
परिवार को एक डोर में पिरोकर रखती हैं ये बेटियाँ कम नहीं ये किसी से.. यूं समझ लो - बेमिसाल होती हैं बेटियाँ रिश्तों की एक खूबसूरत एहसास होती हैं बेटियाँ।।
(स्वरचित) :-तारा कुमारी
(कैसी लगी आपको यह कविता?जरूर बताएं। यदि पसंद आए तो मेरे उत्साहवर्धन हेतू अपना आशीर्वाद दें।और कोई सुझाव हो तो कमेंट में लिखे आपके सुझ…

बादल Badal/Cloud - Hindi poem

बादल /Badal/Cloud - hindi poem (हिन्दी बाल - कविता)   क्या आपने कभी  नीले आसमान में बादलों को  अठखेलियां करते  देखा है?  बादलों को स्वच्छ नीले आसमान में देखना अभूतपूर्व होता है.. आइए, आज हम  आसमान में बिखरे  बादलों  को कविता के माध्यम से  करीब से देखें.. बादलों की कहानी कहती हुई प्रस्तुत है मेरी यह कविता...
  बादल (बाल कविता) उमड़ते घुमड़ते श्वेत चमकीले बादल  संग है इसके नीले आसमान की चादर  ये छोटे बादल, बड़े बादल, सयाने बादल  कभी ये भालू कभी खरगोश की भांति दिखते  बच्चों के मन को ये खूब भाते जरा, इन बादलों की मस्ती तो देखो..  सूरज के संग खेलते ये आंख मिचौली  कभी नारंगी कभी पीत रंग से खेलते ये होली  कभी शांत-चित्त  बिछ जाते आसमान के बिछौने में  कभी खिसकते धीमे-धीमे हवा के मंद चाल में  कभी दूधिया बर्फ-सी पर्वतों के सदृश्य अटल दिखते  हरदम मुस्कुराते आसमान में ये अपनी सुंदरता की छटा बिखेरते  जब आ जाता वर्षा ऋतु..  आते ही ये अपना रंग बदल लेते श्वेत उज्जवल काया को छोड़कर  काला स्याह रूप धर लेते  बिजली रानी भी तब रह रहकर  चमक अपनी दिखाती बादल भी तब गढ़-गढ़ करके खूब ताल मिलाते ।  हवा भी कभी …

सपनें Sapne - A Hindi poem (Motivational poem)

सपनें /Sapne - A Hindi poem (हिन्दी कविता)   हताशा और निराशा कभी भी आशाओं से बढ़कर नहीं होनी चाहिए। जीवन में हार को भी जीत में बदलने की प्रेरणा देती यह कविता आपके समक्ष प्रस्तुत है:-   सपनें कुछ सपने छूट जाते हैं  कुछ सपने टूट जाते हैं और कुछ सपने रूठ जाते हैं।  टूटे सपने घाव दे जाते हैं  जो छूट जाते हैं वो पूरे कब होते हैं  रूठे सपनों में छिपी आशाएं होती हैं  पर आस भी जब टूट जाए तो  ह्रदय में बस  खालीपन घर कर जाते हैं।  मायूस ना होना,  अगर ये लम्हे मिल जाएँ कभी।  सपने तो कुछ टूटेंगे ही  कुछ पूरे होंगे और कुछ रूठेंगे ही  जो मिल गया वह भी कम नहीं  जो ना मिला तो ठहरो नहीं..  हार-जीत तो जीवन की रीत है  धैर्य, साहस और आत्मजय ही मनमीत हैं।  टूटे सपनों को जोड़ना सीख ले जो  जीवन के सतरंगी जंग जीत ले वो कर दृढ़ निश्चय, पथ पर आगे बढ़ो  मुट्ठी में कर लो अपने लक्ष्य को  कर लो सपने पूरे, अपने मन की..।
(स्वरचित)  :-तारा कुमारी

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अनकहे किस्से Ankahe kisse - Hindi poem

अनकहे किस्से /Ankahe kisse
- Hindi poem (हिन्दी कविता)
  अनकहे किस्से..  बेपनाह प्यार है तुम्हारे लिए  लेकिन इस दिल में सिर्फ तुम ही नहीं,  प्यार के गीत गुनगुनाती हूं तुम्हारे लिए पर उनको भी सहेज कर रखती हूँ दिल में अपने।  अगर मायने रखते हो तुम मेरे जीवन में वो भी मुस्कुराते हैं मेरे अफ़साने में मेरी हंसी मेरी उदासी में  हो अगर तुम परछाई मेरी  उनके बिना मैं अधूरी हूँ  मेरी खुशी मेरे हर ग़म में।  माना कि मेरी बेइंतेहा चाहत हो तुम पर उनका भी मान ना होगा कभी कम माँ, जिसने मुझे जन्म दिया पिता, जिसने सर पर
सदैव स्नेहिल हाथ रखा।  वो भाई-बहन जिसके अप्रतिम प्रेम ने मुझे
हमेशा ही तृप्त किया।  वो दोस्त जो निस्वार्थ भाव से  मेरे सुख-दुख के साथी बनते रहे  नहीं जताते कभी कोई हक वो मुझ पर पर दिल में सदा ही बसते हैं वो मेरे।  प्रिय, हो तुम प्रियतम मेरे जो फूल खिलाए हमने मिलकर उसके भी नाम है मेरे ह्रदय का एक टुकड़ा  मेरी सत्ता को मिलकर पूरा करते हैं ये सारे।  बेशक,  जीवन के हमसफर हो तुम  मेरा तन मन ह्रदय तुम्हें समर्पित है
पर सच तो ये भी है...
मेरे वजूद के कई किस्से हैं,  इस दिल के कई हिस्से हैं।
(…

आऊँगा फिर Aaunga phir - Hindi poem

आऊँगा फिर... /Aaunga phir... A Hindi poem     प्रेम में डूबे अधीर मन को थोड़ी तसल्ली और धैर्य बंधाते हुए एक प्रियतम की अपनी प्रियतमा के लिए उभरे भावनाओं को उकेरती प्रस्तुत कविता... 

   आऊँगा फिर..  जो है तेरे मन में  वही मेरे मन में 
न हो तु उदास  तू है हर पल मेरे पास 
अभी उलझा हूँ जीवन की झंझावतों में  रखा हूँ सहेजकर तुझको हृदय-डिब्बी में 
जरा निपट लूँ उलझनों से आऊँगा फिर नई उमंग से 
करना इंतजार मेरा तू मैं जान हूँ तेरी,जान है मेरी तू 
न हो कम विश्वास कभी हमारा चाहे जग हो जाए बैरी सारा
इन फासलों का क्या है...  जब मेरे हर साँस हर क्षण में बसी सिर्फ तू ही तू है |
(स्वरचित)  :-तारा  कुमारी 
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प्रेम - तृष्णा /Prem - Trishna - A Hindi - poem

प्रेम - तृष्णा / Prem - Trishna :- A Hindi-poem
     प्रेम - तृष्णा शुष्क रेगिस्तान में  शीतल प्रेम की एक बूंद की चाह तपते अग्नि सी बंजर भूमि में  ओस-सी प्रेम की एक बूंद की चाह
मृग तृष्णा सी प्रेम की तृष्णा
भटकते छटपटाते मन के भाव
आस देख दौड़ चला उस ओर
पास जाकर कुछ ना मिला
मिली तो बस तपती शब्दों की चुभन
मन को दुखाती कड़वाहट की तपन
बुझ ना पायी मन की तृष्णा
कैसी है ये व्यथा कैसी ये घुटन
पुष्प रूपी कोमल हृदय को
निराशा और वेदना, और घेर आई
प्रेम की चाह ये कहाँ ले आई?
दर्द के समंदर में गोते लगाते रहे
पर साहिल कभी नजर न आई..।

:-स्वरचित
(तारा कुमारी)

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अश्कों से रिश्ता Ashkon se rishta-a Hindi - poem

अश्कों से रिश्ता Ashkon se rishta - a Hindi - poem
  अश्कों से रिश्ता..  अश्कों से कैसा रिश्ता है मेरा? 
 हर बात पर मचल कर
 गालों को चूम लेती है ये ..
 बड़ी जिद्दी है ये अश्क
 रोकना चाहे जब पलकें
 छलकने से इन्हें..
 बनकर मोती  लुढ़क जाती
 पलकों को मात दे जाती है ये!

(स्वरचित)
 :-तारा कुमारी
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मैं हूँ कि नहीं? Main Hun ki nahin? - Hindi-poem

मैं हूँ कि नहीं? Main hun ki nahin? Hindi -poem
मैं हूँ कि नहीं? मेरे सुबह सवेरे में तू , तेरे सलोने शाम में.. मैं हूँ कि नहीं?

मेरे मचलते जज्बातों में तू ,
तेरी बातों में.. मैं हूँ कि नहीं?

मेरी बेचैनी में तू ,
तेरे अमन-चैन में.. मैं हूँ कि नहीं?

मेरे बदहवास धड़कन में तू ,
तेरे तरतीब साँसों  में.. मैं हूँ कि नहीं?

मेरी निराशाओं में तू ,
तेरी आशाओं में..मैं हूँ कि नहीं?

मेरी शख्सियत में तू ,
तेरी परछाई में..मैं हूँ कि नहीं?

हर लम्हा सोचूँ मैं तुझे ,
तेरी सोच में ..  मैं हूँ कि नहीं?

मेरी खामोशी में तू ,
तेरी आवाज में .. मैं हूँ कि नहीं?

मेरी डूबती सांसों में तू ,
तेरी अठखेलियां करती जिंदगी में.. मैं हूँ कि नहीं?

(स्वरचित)
:-तारा कुमारी
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फादर्स - डे Father's day - A Hindi poem

फादर्स -डे Father's day - A Hindi poem
  फादर्स - डे माता है जननी,तो पिता है पहचान इनसे ही होती है जीवन की आन-बान
पिता है पुत्री का पहला सच्चा प्यार इनकी छत्र छाया में न होती कभी हार
पिता का विश्वास देता पुत्र को आत्मविश्वास हार में भी ये दे जाती है जीत की आस
प्यार का अनकहा सागर है पिता  बिना बोले ही समझते ये मन की बात

बचपन की नन्ही ऊँगलियों का सहारा है पिता हर तूफान  में कश्ती का किनारा है पिता

परिवार की हर सपनों में पंख लगाते हैं पिता सब कुछ खामोशी से सह जाते हैं पिता 
सैकड़ों झंझावत को खड़ा अकेले झेलते हैं पिता जीवन के हर कड़वे अनुभव को प्यार से बताते हैं पिता
कभी बेटी की विदाई में दिल से रोते हैं पिता फिर 'रखना खयाल बेटी का' हाथ जोड़कर विनती करते हैं पिता
बच्चों की जीत से चौड़ी हो जाती है पिता का सीना सब की इच्छा पूर्ण करना ही है उनका जीना 
कभी सुख-दुख का मेला है पिता  कभी हंसी ठिठोले तो कभी अनुशासन है पिता
है अभिमान तो कभी स्वभिमान है पिता कभी जमीं तो कभी आसमान है पिता सब फलते-फूलते हैं जिनकी छाँव में.. वो वृक्ष है पिता|
स्वरचित :-(तारा कुमारी) More poems you may like…

चाहत Chahat -Hindi poem

चाहत Chahat-A Hindi poem     चाहत Chahat - Hindi poem  कद्र करना उनकी दिल से  जो आपके गम में रोते हैं..  बहुत कम मिलते हैं ऐसे लोग  जो अपने दुःख में भी आपके दुःख को महसूस करते हैं। 
यूँ तो हजार ख्वाहिशें होती उनके भी दिल में  पर ना कोई जिद ना कोई माँग..  आपकी एक हँसी की खातिर  छुपा लेते नम आँखों को हँस कर पल में  । 
दिल ना दुखाना उनका  जो हर नाज़ व नखरों को उठाते हैं..  खुद रूठे हों तब भी वो  आपको रूठे देख मनाते हैं। 
नादान सा है दिल उनका  ना तोड़ देना उनका दिल अपनी अना में..  जो अपनी बचपना छोड़ आपके लिए  मुस्कुरा कर बड़प्पन दिखा जाते हैं। 
कद्र करना उनकी दिल से  जो आपके गम में रोते हैं..  बहुत कम मिलते हैं ऐसे लोग  जो अपने दुःख में भी आपके दुःख को महसूस करते हैं। 

(स्वरचित)  : तारा कुमारी  More poems you may like:-
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खामोशी/Khamoshi/Silence - Hindi poem

ख़ामोशी khamoshi/Silence - Hindi poem

ख़ामोशी khamoshi - Hindi poem जब उम्मीदें टूट कर बिखरती हैं लफ्ज़ जुबां से गुम हो जाते हैं  ठहर सा जाता है वक्त सन्नाटा छा जाता है जब जुबां खामोश हो जाती हैं  खामोशी ही शोर मचाती है  सुन पाता वही इस शोर को  जिसने खामोशी ओढ़ी है  बेसबब नहीं होती ख़ामोशी  जब दर्द हद से गुज़र जाता है  हर राह बंद हो जाता है
बना मैं सबका साथी
ना कोई बना मेरा हमदर्द  रोकने के लाख मशक्कत के बाद भी  जब आँखों से आँसू लुढ़क ही जाते हैं  उँगलियाँ चुपके से उनको पोंछती तब ख़ामोशी ही बेह्तर लगती  जब कोई ना पहुँचे दुखती रग तक  तब ख़ुद को खुद ही समझाना होता है  ना उम्मीद रखो किसी से  दिल को ये बतलाना पड़ता है  ख़ामोशी ही तब हर मर्ज की दवा बन जाती  सुकून व मरहम ज़ख्म की बन जाती  ये सफर है तन्हा और तन्हाई का
साथी हैं खुद का खुद ही  बाकी तो सब सफर के मुसाफ़िर होते हैं
पल दो पल के साथी होते हैं..
बाकी तो सब सफर के मुसाफ़िर होते हैं
पल दो पल के साथी होते हैं..।
(स्वरचित)  :- तारा कुमारी  More poems you may like:-
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दोस्त और दोस्ती/मित्रता Dost aur Dosti/Mitrata - Hindi Poem

दोस्त और दोस्ती /मित्रता - हिन्दी कविता  दोस्ती सभी रिश्तों में सबसे खूबसूरत रिश्ता होता है और उसे निभाने वाले उससे भी खूबसूरत लोग होते हैं। दोस्त और दोस्ती शब्द हमारे जेहन में आते ही कई बेशकीमती मीठी यादें तैरने लगती है.. है ना.. 
इन्हीं कई सुखद पलों को जीती ये कविता आपके समक्ष प्रस्तुत है..

दोस्त और दोस्ती /मित्रता Dost aur Dosti /Mitrata /friendship - Hindi poem
कुछ रिश्ते होते खून के  कुछ रिश्ते बन जाते दिल के  ना बंधते ये रिश्ते जाति - धर्म से  बस मन में समा जाते एक दूजे के कर्म से  ये रिश्ता है दोस्त और दोस्ती का  जो होता है सबसे ज़ुदा  ना कद देखती ना उम्र देखती  ना देखती ये रंग - रूप  बस मन मिले और
हो जाए अजनबी भी मीत  है दोस्ती की अनोखी रीत  दोस्त बन जाते कभी पड़ोसी  तो कभी कोई परदेशी  कभी दोस्त बन जाते  अनजान डगर के राही  दोस्ती की बुनियाद होती विश्वास पर  स्नेह पर, अपनत्व पर  जब सारे रिश्ते छूट जाते  तब भी साथ खड़े रहते ये  दुःख में हौसला देते हैं ये  सुख में संग मस्ती करते  गम को हँसते हँसते बाँट लेते ये  खुशियों को दूना कर देते
कहते हैं उनको गरीब
जिनका ना हो कोई मित्र
अनम…

ना देख सका वो पीर Na dekh saka wo pir - Hindi poem

ना देख सका वो पीर  उसने उतना ही समझा मुझको
जितना उसने जाना खुदको
उसकी बेरूखी ने बंधन तोड़ दिये दिल के
एक तरफ आसमाँ रोया टूट के
एक तरफ हम रोये फूट  के
देखा उसने आसमाँ की बारिश
देख सका ना आँखों का नीर
भीगा वो बरसात में झूमकर
मेरी आँखें रोई उसकी यादों को चूम कर
उसका तन भीगा पानी में
मेरा मन भीगा आंसुओं में
ना देख सका वो पीर
ना पोंछ सका वो नीर
उसने उतना ही समझा मुझे
जितना उसने जाना खुदको
उसने उतना ही देखा मुझको
जितना उसकी नजरों ने देखा मुझको..

(स्वरचित)
:-तारा कुमारी
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दिल मेरा यूँ छलनी हुआ Dil Mera yun chhalni huwa - Hindi poem

दिल मेरा यूँ छलनी हुआ  तेरे पहलू में आकर भी चैन ना मिला
तलाश थी राहत की
दिल के बोझ को तुझसे बांट कर
कम करने की
रोये हम तेरे बाजुओं में टूट कर
फिर भी दिल को आराम ना मिला
जो तेरे अंदर मेरे लिये शक़ से हम रुबरु हुए
सुकून ए दिल और कहीं ज्यादा गुम हुआ
ग़म के बोझ को सहा ना गया हमसे
दिल मेरा यूँ छलनी हुआ
जो टूट कर बिखरे ऐसे
कि दोबारा हमसे खुदको समेटा ना गया
ख्वाहिश थी चमन में खुशबू बन कर महकने की
सौ टुकड़ों में बांट कर बिखेरा गया..

(स्वरचित)
:-तारा कुमारी
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बुरा नहीं हूँ मैं। Bura nahi hun main-Hindi poem

बुरा नहीं हूँ मैं। Bura nahi hun main. - Hindi poem     दुनिया में कई तरह के लोग हैं.. कुछ लोग बेल की तरह होते हैं जो बाहर से तो कठोर होते हैं किन्तु अंदर से कोमल और मीठे होते हैं। उनके ऊपरी स्वभाव से लोग अक्सर ही धोखा खा जाते हैं और उन्हें बुरा समझ लेते हैं।     वहीँ कुछ लोग बेर की तरह होते हैं जो ऊपर से कोमल और मीठे होते हैं किन्तु अंदर से कठोर और सख्त।
इन्हीं भावनाओं से ओत-प्रोत ये कविता आप सब के समक्ष प्रस्तुत है -

बुरा नहीं हूँ मैं।  हाँ, मैं तीखा बोलता हूँ  सच बोलता हूँ  कड़वा बोलता हूँ  लेकिन, बुरा नहीं हूं मैं। 
दिखावे की मीठी बोली नहीं बोलता पीठ पीछे किसी की शिकायत नहीं करता मन में दबाकर कोई बैर भाव नहीं रखता कुंठित विचार नहीं पालता   हाँ, बुरा नहीं हूं मैं। 
किसी का बुरा नहीं चाहता किसी पर छुपकर वार नहीं करता  कभी ह्रदय छलनी हो जाए तो छुपकर अकेले रो लेता  सबकी मदद दिल से करता हाँ, बुरा नहीं हूं मैं। 
अपनी जिम्मेदारियों से बैर नहीं मुझे कर्म ही मेरी पहचान है छलावे के रिश्ते बनाना नहीं आता मुझे बुरे वक्त में साथ छोड़ना नहीं सीखा मैंने  हाँ, बुरा नहीं हूं मैं। 
मौकापरस्त दुनिय…

जीवनसंगिनी Jiwansangini - Hindi Poem

जीवनसंगिनी /पत्नी /Life partner - हिन्दी कविता     जीवन में एक रिश्ता बड़ा ही अनूठा होता है :- पति - पत्नी का रिश्ता। इस संबंध की डोर जितनी कोमल होती है, उतनी ही मजबूत भी। पति - पत्नी का संबंध तभी सार्थक होता है जब उनके बीच प्रेम सदा तरोताजा बनी रहे।     इन्हीं कोमल भावनाओं के साथ यह कविता प्रस्तुत है जिस में एक पति  ने अपनी जीवनसंगिनी के लिये अपने कोमल भावनाओं को अभिव्यक्त किया है। 

     जीवनसंगिनी  मेरी साँसे हो तुम  मेरी धड़कन हो तुम..  मेरी अर्धांगिनी,
मेरी जीवनसंगिनी।  मेरे जीवन का आधार हो,  सात जन्मों का प्यार हो।  माना कि थोड़ी अकड़ती हो तुम,  माना कि थोड़ी जिद्दी हो तुम।  पर तुम ही मेरा साज हो,  तुम ही मेरा नाज हो।  हर सुख दुख की साथी तुम,  मेरे लड़खड़ाते कदमों का सहारा तुम।  बिन तेरे मैं था अधूरा-सा,  करते हो तुम मुझे पूरा-सा।  तू मेरी आदत, तू मेरा संबल  तू मेरी मनमीत, तू मेरी गजल।  तेरे आने से खिला नन्हा पुष्प आंगन में,  है तुझसे अब अटूट रिश्ता जीवन में।  करता हूं मैं दिल से स्वीकार,  हाँ, तुझसे है बेइंतेहा प्यार।  मैं दीया और तू है बाती  है दुआ ये..  रहे सदा तू, मेरी ही जी…

विरह - वेदना Virah Vedana Hindi - poem

विरह - वेदना  शीशे का ह्रदय उस पर नाम लिखा कोई  ठेस लगी टूट गया,चूर हुए सपने  है रोती आंखें, जान सके ना कोई  है दिल तो अपना लेकिन प्रीत पराई   हूक उठी दिल से, अश्कों ने ली जगह आंखों में  क्या हुआ, जान ना पाए कोई
 उदास आंखें राह देखती नजरें  ना कोई आस, फिर भी आशा के दीप जले  बुझती, ताकती आशाएं  हृदय को चीरती,  फफक कर रो पड़ती आंखें  क्रंदन करता मन, जान सके ना कोई
 साथ ना छोड़ेंगे कभी, ये वायदा था  याद ना रही अब मैं, जो मेरा जीवन था  ना किया स्वीकार गुनाह अपना  लाद दिया हर बोझ मुझ पर   नन्हीं चिड़िया टूट गई,  रूठ गई, जग से छूट गई 
 था वह कैसा बेरहम दिल   जब मन भरा छोड़ गया  मासूम दिल को तोड़ गया  ना देखा मुड़कर पल भर भी  आंसू बहते अब भी याद में उसके   धोखे थे हसीन, दिल से लगाया था मैंने
 सच माना था मैंने, अपना जाना था मैंने  दिल टूट गया,   साथ छूट गया   लेकिन अब भी भरम है वफा का   टूटेगा वह भी धीरे-धीरे   भूल जाना है मुश्किल, क्या करें? 
 कुछ तो सुकून मिल जाए दिल को   कुछ ऐसा हो जाए   नहीं देखा जाता इसका तड़पना, तरसना, बरसना   जीना भी जरूरी है, कैसे जिया जाए?   कांपता है देह,   ना मान…

इंतज़ार Intezaar-hindi poem

इंतज़ार कुछ हलचल सी है सीने में सुकून कुछ खोया - सा है जाने कैसी है ये अनुभूति  दिल कुछ रोया - सा है कुछ आहट सी आयी है  और दिल कुछ धड़का - सा है
हाथ - पाँव में हो रही कंपन-सी  बेचैनी ये जानी पहचानी - सी है  सांसे भी है कुछ थमी - सी  कितने वक्त गुज़र गये इन्तजार में मेरी आहें लेकिन ना हुई कम
पलकें अब मूँदने लगी हैं  साँसें पड़ रही अब क्षीण अब तो आ जाओ इन लम्हों में जाने कब लौटोगे?  आने का वादा था और ना भी था पर, तेरा इन्तज़ार तो था.. 
सारी हदें तोड़ कर आ जाओ  दुनिया की रस्मों को छोड़ कर आ जाओ  चंद लम्हों के लिए..  अब तो आ जाओ कुछ पल  सिर्फ मेरे लिए.. सिर्फ मेरे लिए |
(स्वरचित)  :तारा कुमारी 
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चुनौती Chunautee - A short- story

चुनौती  (हम अपने जीवन में प्रत्येक दिन अलग-अलग चुनौतियों का सामना करते हैं |और उस चुनौती का सामना हम किस प्रकार करते हैं, यह हम पर निर्भर करता है|आज ऐसे ही एक चुनौती के साथ स्वाति की कहानी आप सबके साथ साझा कर रही हूं|)           स्वाति की गोद में 9 माह का उसका पुत्र सौरभ बड़े चैन की नींद सो रहा था|वहीं स्वाति की नींद उड़ी हुई थी |          अगले ही महीने उसके पोस्ट- ग्रेजुएशन के प्रथम वर्ष की परीक्षा शुरू होने वाली थी| स्वाति का आधा वक्त कॉलेज में गुजरता तथा घर वापस लौटने पर सौरभ के देखभाल में बाकी वक्त गुजर जाता|         उसे समझ नहीं आ रहा था कि वह परीक्षा की तैयारी कैसे करें?         पति दीपक से कोई खास मदद नहीं मिलती थी|सुबह जल्दी घर से ऑफिस के लिए वह निकल जाते तथा वापसी में देर शाम हो जाया करती| स्वाति घर के काम एवं बच्चे की देखभाल के साथ पढ़ाई भी करती|          स्वाति के लिए सौरभ की देखभाल जहां एक ओर अत्यंत महत्वपूर्ण था तो परीक्षा में अच्छे अंक प्राप्त करना उसका सपना भी था |         लेकिन समय का अभाव था| स्वयं की देखभाल भी माता होने के नाते आवश्यक था| इन सार…

सपनों की उड़ान Sapno ki udaan - hindi short - story

सपनों की उड़ान        मधु के लिए आसमान से अपने करीब बादलों को देखना सिर्फ ख्वाब पूरा होना नहीं था बल्कि एक जंग जीतने जैसा भी था.. बादलों का कभी समंदर की तरह दिखना कभी असंख्य पहाड़ों की तरह दिखना बहुत रोमांचकारी था.. सूर्य की चमकती किरणें  बिलकुल पास प्रतीत होना भी कम रोमांचक न था.        मधु की ये पहली हवाई यात्रा थी. उसने खास तौर से खिड़की वाली सीट खुद के लिए लिया था. इस यात्रा तक  पहुंचने में मधु ने कम उतार चढ़ाव नहीं देखे.
     ..मधु आज भी अपनी हवाई यात्रा को बार बार याद करती और मुस्करा उठती है.. उसके तन-मन मे एक अजीब सी खुशी की लहर दौड़ जाती... सपने पूरे होने के एहसास की खुशी. अपने आप ही चेहरे पर मुस्कान दौड़ जाती.
       जब लॉकडाउन में दूरदर्शन पर रामायण के दुबारा प्रसारण की बात मधु ने सुना तो सहसा उसकी याद ताजा हो गयी और वह  मुस्कुरा उठी..
       रामायण से एक विशेष जुड़ाव था मधु का.. उसके एक सपने का... बात उन दिनों की है जब मधु सिर्फ सात वर्ष की थी| तब पहली बार रामायण टीवी पर प्रसारित हो रहा था उस समय रामायण का जो क्रेज था, वह देखने लायक था|
       लोगों के प…

कर भला तो हो भला - Hindi Short - story

कर भला तो हो भला
       रीना दसवीं कक्षा की छात्रा है तथा अपने माता-पिता तथा भाई-बहनों के साथ गर्मी की छुट्टियां मनाने शहर से गांव आई है |        गांव में अपना पुश्तैनी मकान है |वहां की हरियाली हरे भरे खेत रीना को खूब आकर्षित करते हैं | खास कर दो चीजें- एक तो घर के पास एक तालाब का होना जहां बच्चे मछलियां पकड़ते तथा तालाब के किनारे इमली के पेड़ में झूले डालकर पूरे दिन झूला झूलते |       वहीं घर से कुछ दूरी पर  खेतों के ठीक बीचोबीच एक पुराना शिव मंदिर है जहां रीना प्रत्येक दिन शाम के वक्त जरूर जाया करती तथा माथा टेक कर ही वापस आती| पता नहीं क्यों वहां जाकर रीना को बहुत ही शांति और सुकून महसूस होता| उस मंदिर के शिवलिंग के ऊपर हर वक्त एक छोटे मटके से जल की बूंदें गिरती रहती |         एक दिन की बात है, रीना के साथ उसकी छोटी बहन टीना ने भी शिव मंदिर जाने की जिद की |          टीना कक्षा 6 की छात्रा थी| टीना का स्वभाव बहुत ही चंचल था| वह कभी भी किसी बात को गंभीरता से नहीं लेती और सारा दिन हंसती खेलती व्यस्त रहती|         पिताजी उसे अक्सर ही डांट दिया करते ताकि वह  पढ़ाई पर भी …

मातृ-दिवस Mother's day - Hindi poem

मातृ-दिवस माँ जननी है, जन्मदात्री है  प्रेम की अविरल बहती समंदर है  दुखों को झेलती अडिग पर्वत है  स्नेह की वर्षा करती फुहार है 
ना होती इस रिश्ते में मिलावट  ना होती कभी चेहरे में थकावट  लबों में रहती हरदम दुआएँ  पूत हो जाए कपूत, ना होती कुमाता 
माँ की आँखें थक कर बंद होती भले  पर सोते में भी होती फिक्रमंद  है माँ ही प्रथम शिक्षिका  है माँ ही प्रथम सखा
माँ तो है प्रेम की अनंत सरिता  कैसे व्यक्त करूँ मैं शब्दों में  नहीं समा सकती तुम  शब्दों के अर्थों में.. 
नहीं है मोहताज माँ का प्रेम एक दिवस की,  हर दिन ही है मातृ-दिवस ना देना कभी दुःख माँ को  आदर करो माँ का उम्रभर.. 
यहीं है स्वर्ग यही है धर्म  है मातृ-दिवस की भेंट यही |
(स्वरचित)  :- तारा कुमारी
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यकीन
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यकीन yakin - Hindi poem

यकीन  यकीन - तीन अक्षरों से बना यह शब्द इस के हैं खेल निराले  कभी यकीन कर कोई खिल गया तो किसी के जीवन में पड़ गए शून्य  धोखे मिले हजार कभी कभी सौगात खुशियों की  कभी दोस्त बना दे पल में कभी लगा दे हजार पहरे  जब रूठ जाती है यह बिखर जाता है सब पल में यकीन जब वास करती है मन में  सब कुछ खिल जाता है जैसे पल में अजीब है दास्ताँ यकीन का  नहीं दिलाना पड़ता यहां यकीन नफरत का मगर हैरत है, सबूत मांगते लोग मोहब्बत का एक वक्त वह था जब जादू पर भी यकीन था  एक वक्त यह है  जब हकीकत पर भी शक है अगर करना ही है यकीन  तो कर खुद पर यकीन तू  ना टूटेगा तू कभी, ना रूठेगा तू  हिम्मत जो कभी कम हुई तो उठ खड़ा होगा फिर तू रख विश्वास खुद पर -  है यही रास्ता, नहीं रहेंगे सपने अधूरे मिलेगी मंजिल तुझे, ख्वाब होंगे सारे पूरे|
(स्वरचित)  :-तारा कुमारी More poem you may like :-1. कहते थे साथ ना छोड़ेंगे हम 2. किताब की व्यथा
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दुःस्वप्न-कोरोना से आगे (Nightmare - beyond Corona ) - Hindi poem

दुःस्वप्न - कोरोना से आगे है खड़ा ये विकराल सवाल राजस्व का है ये कैसा जाल लॉकडाउन की कहां गई सख्ती क्या है ये लालसा पाने की तख्ती?  सरकार ने खोला मधुशाला का द्वार   सोशल डिस्टेंसिंग का हुआ बुरा हाल  क्या होगा भगवन देश का- आपदा क्या कम थी कोरोनावायरस का?
वित्तीय आपातकाल की आशंका है क्या देश को..
केंद्र ही चलाएगा क्या राज्यों को?
रिश्ते तो हो ही चुके थे ऑनलाइन
पढ़ाई भी अब हो गयी है ऑनलाइन
क्या गुरुओं का अब महत्त्व रहेगा!
जब ह्वाटसअप से देश चलेगा..  गरीबों की गरीबी अब और बढ़ेगी  पूंजीपतियों की अब खूब चलेगी  मध्यमवर्ग जब नहीं रहेगा
न्याय की लड़ाई तब कौन लड़ेगा  निम्न या उच्च वर्ग ही जब रह जाएगी  एक पर होगा राज, दूसरा भोगेगा विलास जैविक हथियार  के उपयोग से होगा शक्ति-प्रदर्शन  क्या आएगा अब तानाशाही का जेनेरेशन?  है चिंतित करती ये दुर्दशा मन होता विचलित, होती हताशा
है कैसी ये दुःस्वप्न..  क्या होगा इस देश का कल?  है खड़ा  ये विकराल सवाल,  है खड़ा ये विकराल सवाल..!! 
(स्वरचित)  :-तारा कुमारी More Poem you may like :-1. वक्त और त्रासदी
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कहते थे साथ ना छोड़ेंगे हम - Hindi poem

कहते थे साथ ना छोड़ेंगे हम  कहते थे साथ ना छोड़ेंगे हम,  आज वो रिश्ते यूँ रुसवा हो गए |
मेरी होंठो पे हंसी देखेंगे हर दम,  कहने वाले आज बेगाने हो गए|
आँखों में खुशियों की चमक देने वाले,  आज उदासी का आलम दे गए |
छोटी - सी बात का तल्ख क्यूँ इतना,  प्यार के वादे का हर जुमला झूठे हो गए |
इश्क में जला करते थे जो दिन - रात,  अब वो परवाने नफ़रत में जल गए |
हो जाती सुलह माफ़ी दिल में रखने से,  वो तो अपनी जिद के पैमाने हो गए|
हार में ही होती है, मुहब्बत की जीत
जीतने की जुस्तजू में वो जुदा हो गए |
दिल  धड़कता था जिसके लिए हर पल,  वह दिल अब खौफ में गमजदा हो गए|
पहुंच जाते थे मेरी खामोशी में जो मुझ तक,  वो आज लफ्जों में अलविदा कह गए||
(स्वरचित)
:- तारा कुमारी More Poem you may like..1. एहसास 2. उलझन 3. यादें 4. नहीं हारी हूँ मैं

जलेबी Jalebi - A Hindi short - story

जलेबी        स्कूल से आती परेड एवं देशभक्ति गीतों की सुरीली आवाजें कुसुम को घर में भी साफ़ - साफ़ सुनायी दे रही थी |       वह 15 अगस्त, स्वतंत्रता-दिवस का दिन था |बिल्कुल पास में ही स्कूल था|कुसुम एक गृहिणी है उसका एक बेटा है - शुभम, जो लगभग 4 वर्ष का है |       सुबह उठते ही शुभम स्कूल के लिए तैयार होने की जिद कर समय से पहले ही तैयार होकर बैठ गया |       आखिरकार, कुसुम ने खुदको जल्दी से तैयार किया और शुभम को स्कूल छोड़ आयी |
       कुसुम का घर सड़क के एक ओर था तो दूसरी ओर स्कूल था |करीब 200 मीटर की दूरी होगी ¦कुसुम स्कूल पास होने के कारण खुश थी कि वह बच्चे को स्कूल छोड़ने ले जाने में कम समय लगता |
      लेकिन हाईवे के कारण सड़क पर चलने वाली गाड़ियों की लाइन लगी रहती तथा आए दिन कोई न कोई दुर्घटना भी होती रहती|
       शुभम के स्कूल जाने के बाद कुसुम घर के कामों को निपटाने लगी| झंडोत्तोलन के बाद शुभम के स्कूल में कुछ प्रोग्राम  होने वाले थे, उसके बाद छुट्टी|
      दिन के 11:00 बज चुके थे कुसुम घर के सभी काम निपटा कर शुभम के स्कूल जाने की तैयारी करने लगी तभी उसे बाहर कैंपस के गेट के खुलन…

किताब की व्यथा Kitab ki vyatha -Hindi poem

किताब की व्यथा 
दूर बैठी एक स्त्री सिसकती देख, कदम बढ़ गए उस ओर  कंधे पर रखकर हाथ पूछा मैंने - कौन है तू? क्यूं रोती है तू वीराने में? सुबकते हुए कहा स्त्री ने - किताब हूँ मैं... त्याग दिया है मुझे जग ने  बचपन की सुखद सहेली को भुला दिया है सबने..
चंदा मामा, नंदन, सुमन - सौरभ चाचा - चौधरी और नागराज बच्चों का दिल बहलाया मैंने  परियों की कहानी सुनायी  जंगल - बुक की दुनिया दिखाई मैंने नवयुवायों के  प्रेमसिक्त पुष्प को अपने आलिंगन में छुपाया मैंने  सूखे पुष्पों को वर्षों पन्नों में  याद बना कर संजोया मैंने..
कभी कथा - उपन्यास बनकर मुस्कान चेहरे पर खिलाया मैंने इतिहास, भूगोल, चांद - तारे समझाया मैंने.. सिसकती स्त्री ने देह पर लगी धूल दिखाया शब्दों से अपना ज़ख्म मुझे बतलाया सुनकर मेरी तन्द्रा  भंग हुई  सोती हुई से मैं जाग पड़ी  अरे..! ये क्या सपने में बात हुई! किताब से मेरी मुलाकात हुई |
सत्य थी ये व्यथा कथा  हैरान होकर ढाढस बंधाया मैंने  मन ही मन कहा मैंने - बेकार ही दुखी तुम होती हो  आज भी मेरे सिरहाने तुम सोती हो  रोज सुबह - शाम साथ मेरे रहती हो, ज्ञान के अखंड - ज्योत तुम जलाती हो…

सूक्ष्म - शत्रु sukshhm-shatru - Hindi poem

सूक्ष्म - शत्रु है जगत में सूक्ष्म - शत्रु का वार चारो तरफ है फैला  हाहाकार  है बड़ा ये covid-19 विध्वंसकारी अमेरिका, इटली, चाइना सब पर  पड़ गया ये कोरोना वाइरस भारी
छुने से फैले ये, साँसों से फैले  ऐसी है ये महामारी.  कट गए हम दुनिया से  पर कोरोना का है आतंक जारी वाइरस ने लिया सहारा उनका हम से जो हो जाती लापरवाही  ना अन्तर करे ये मजहब की ना अमीरी - गरीबी की समता है इसका उसूल  यह बीमारी है जहान की 
है भयावह दृश्य अब बनता हर तरफ है संक्रमण बढ़ता  आम आदमी कैसे रहें सुरक्षित  नर्स डॉक्टर स्टाफ हुए संक्रमित  देश दुनिया हो रहे बर्बाद  कैसी विडंबना बन पड़ी है आज  बढ़ती जा रही अवधि लॉकडाउन की  आँधी-सी चल रही मन में  आशा - निराशा की. 
है विचलित करने वाली इसका प्रहार पर हमने भी नहीं मानी है हार  हाथ धोना, सोशल - डिस्टेंशिंग है यही कल्याणकारी.  रहो घर के अंदर  करते रहो खुदको सेनेटाइज यही है मांग सुरक्षा की 
है तोड़ना कड़ी - संक्रमण का  लॉकडाउन का पालन  है रास्ता बचने का खुद की करो सुरक्षा और करो सब की परवाह  यही है मूलमंत्र - इसे खत्म करने का |

(स्वरचित)
:तारा कुमारी
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