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Showing posts from 2020

कश्मकश kashmakash - Hindi poem

कश्मकश / Kashmakash - हिंदी कविता(Hindi poem) (जिनके बारे हमें लगता है कि वो हमारा दर्द नहीं समझ सकते, हम उन्हें नजरअंदाज करते हैं। लेकिन हो सकता है वो उसी दर्द से गुजर रहे हों और उन्होंने कभी जताया ना हो।ऐसे में जब हम उन्हें ' तुम नहीं समझोगे ' जैसी बातें  कहकर और दर्द दे जाते हैं तो वो चुपचाप सहना ही बेहतर मान लेते हैं। और हमें इस बात का एहसास तक नहीं हो पाता।) क्या आपने ऐसे परिस्थितियों का कभी सामना किया है?कुछ ऐसे ही आंतरिक संघर्षों और भावनाओं से ओतप्रोत ये छोटी सी कविता आपके समक्ष प्रस्तुत है:- कश्मकश एक कश्मकश इधर है  एक कश्मकश उधर है। उसने तो अपने टूटते घरौंदे  दिखा दिए हम ना दिखा सके अपना टूटता हुआ वजूद। जमाने के मखौल से छिपा रखा है अब तक वरना घरौंदा तो टूटा हुआ हमारा भी है। और वो सोचते हैं कि हमें अंदाजा ही नहीं  घरौंदे के टूटने की कसक.. बरसों जिन हालातों को जीती आयी हूं उन्हीं में से चंद रोज गुजर कर वो हमें ही नासमझ और खुशनसीब कहते हैं। जिस दर्द में डूबी कश्ती का आईना हैं हम उसी पर सवार होकर नये सफर के अनुभव हमसे बांटते हैं वो। कहते है तुझे पता ही नहीं, इसलिए तुम समझत

मेरी मुहब्बत इतनी खूबसूरत ना थी Meri muhabbat itni khubsurat na thi - Hindi poem

  मेरी मुहब्बत इतनी खूबसूरत ना थी (हिंदी कविता)  Meri muhabbat itni khubsurat na thi - Hindi poem कहते हैं.. मुहब्बत दुनिया की सबसे खूबसूरत तोहफ़ा है।कोई कहता है .. मुहब्बत आग का दरिया है।किसी के लिए  हसीन दुनिया तो किसी के लिए बर्बादी का रास्ता।जितने लोग उतनी ही बातें उतने ही अनुभव। लेकिन जितनी भी बातें कर ले जमाने भर में लोग.. इस मुहब्बत के बिना बात पूरी होती ही नहीं।मुहब्बत के कई रंगों में से एक रंग को बयां करती चंद लाइनें आपके समक्ष प्रस्तुत है:- मेरी मुहब्बत इतनी खूबसूरत ना थी। मुझे नहीं आता था  दर्द सहना दौड़ी चली आती थी तुम्हारे पास मुझे नहीं आता था चोट छुपाना दिखा दिया करती थी हर उदासी प्यार के दो बोल और साथ हो हर पल इस एहसास को पाने की जिद करती थी और इस जिद में कई गलतियां  कर जाती थी.. मुझे पता है - मेरी मुहब्बत इतनी खूबसूरत ना थी, इसलिए तुमने दूरी बना ली मुझसे। दूसरों के लिए तुम्हारा वक़्त देना और मेरे लिए मजबूरियां गिनाना कतई ना भाता था मुझे रूठ के कर बैठती थी शिकायतें मनाने के बजाय बेरुखी दिखाते थे तुम मुझे नहीं आता था इसे बर्दाश्त करना बोल जाती थी  बुरा भला मैं तुम्हें.. म

कविता की छटा kavita ki chhata - Hindi poem

कविता की छटा (हिंदी कविता) kavita ki chhata (Hindi poem)   कविता क्या है?  इसका उत्तर सीमित नहीं हो सकता।यह वो रोशनी है जिसकी चमक अलग अलग रूपों में हम तक पहुंचती है।इसकी छटा को चंद शब्दों में कविता के रूप में ही  उकेरने की छोटी सी कोशिश करते हुए ये कविता आपके समक्ष प्रस्तुत है :- कविता की छटा - Hindi poem  मन के भावों को जो पंख दे दे    वो सशक्त अभिव्यक्ति की दुनिया है कविता। शब्दों की खूबसूरत धागे में गुंथी एक सुगंधित हार है कविता। खूबसूरत फूलों के बागों में परियों की कहानी है कविता। सूरज की खिलती धूप में नहाती चांद की चांदनी बनकर खिलखिलाती, मूक अमूक सब की भाषा बनकर शब्दों से जीवंत दृश्यों का सृजन करती है कविता। कवि की सतरंगी कल्पना बन कर कल्पना के विहंगम सैर कराती है कविता। कविता कभी सुकोमल, कभी मनभावन, कभी कवि के सुख - दुख को, कभी जनमानस के मर्म को ऊकेरती.. हृदय को है ये झकझोरती। प्रेम, दुख, क्रोध,वीरता और कभी प्रतिकार की संदेशा है कविता। कभी छंद कभी मुक्तक कभी दोहा बन कई विधाओं में, मन को शीतल करती है कविता। कभी वीर रस, कभी ओज रस में डुबकी लगाकर सम्पूर्ण समाज को राह दिखाती है कविता

वो तुम थे और मैं थी wo tum the aur main thi - Hindi poem

वो तुम थे और मैं थी। (हिंदी कविता) / Wo tum the aur main thi. (Hindi poem) ( मन के कुछ कोमल भावनाएं हमारे हृदय में इतनी गहरी बस जाती हैं कि जिंदगी के हर मोड़ पर हमारे साथ साथ चलती हैं। वक़्त बदल जाता है,लोग बदल जाते हैं और हम  चाहकर भी ना उनसे मुंह मोड़ पाते हैं ना भुला पाते हैं।बस कहीं किसी कोने में उन यादों को उम्रभर अपने सीने में संजोए रख लेते हैं।) वो तुम थे और मैं थी  पल पल मुझे याद करना बातें करने के बहाने तलाशना तुम भूल गए वो दिन! वो तुम थे और मैं थी.. मेरी धड़कनों में बसे हैं, अब भी वो दिन। मीठी मीठी बातों के मेले में खो जाना और सड़कों पर लंबे सफर पर निकल जाना तुम भूल गए वो दिन! वो तुम थे और मैं थी.. मेरी धड़कनों में बसे हैं, अब भी वो दिन। मुझे देखते ही गालों पर खुशी की लालिमा छा जाना तेरी पूरी दुनिया का सिर्फ मेरे ही इर्द गिर्द सिमट जाना तुम भूल गए वो दिन! वो तुम थे और मैं थी.. मेरी धड़कनों में बसे हैं, अब भी वो दिन। कहीं खो गए अब वो सारे लम्हें पास होकर भी कहीं गुम हो तुम  हुक सी उठती है सीने में, अजनबी नजरों से जब मुझे देखते हो तुम। मुझे अब भी याद आते हो तुम... हां, मुझे अब

रूठे बैठे हो क्यों? Ruthe baithe ho kyon? - Hindi poem

रूठे बैठे हो क्यों? (हिंदी कविता) Ruthe baithe ho kyon ? ( Hindi poem)  (हम अक्सर छोटी बड़ी बातों पर कई बार अपनों से या दोस्तों से नाराज़ होकर रूठ जाते हैं और उम्मीद करते हैं कि हमें मनाया जाए। जब लोग या हमारे अपने हमें मनाते हैं तो खुदको बहुत खास महसूस करते हुए हम उनसे और ज्यादा जुड़कर उनके करीब हो जाते हैं।ये हमें खुशी देती है।लेकिन यदि जिससे उम्मीद करते हैं कि वो हमें मनाए वो ही अगर हमें अनदेखा करे तो हम भावनात्मक रूप से अधिक घायल महसूस करते हैं। ऐसे में क्या किया जाए?जिससे हम खुश रह सकें।कुछ ऐसी ही भावनाएं समेटते हुए ये कविता प्रस्तुत है -  रूठे बैठे हो क्यों? रूठे बैठे हो क्यों? आंखें उदास हैं क्यों? किसी की राह ताक रहे हो क्या? अपना दिल जलाते हो क्यों? रूठा तब जाता है..  जब कोई  मनानेवाला हो। गर ना हो कोई मनाने वाला  तो फ़िक्र ना कर ऐ दोस्त बस रूठना छोड़ दे और तनिक भी गम ना मना इस बात का.. जीवन जी भर जीने का नाम है, अंधेरे कोने में छुपकर आंसू बहाने का नहीं। खुदको दे दो एक नया मोड़ मुश्किलों की तो लगी है होड़। मान ले तू , बस एक बात पते की हर तरफ हैं खुशियां तेरे लिए। गर गम मिल जाए

आज फिर आंखें बरस गईं। Aaj phir aankhen baras gayin. A Hindi poem

आज फिर आंखें बरस गईं।(हिंदी कविता) Aaj phir aankhen baras gayin.(hindi poem) आज फ़िर आंखें बरस गईं। आज फिर आंखें बरस गईं कुछ यूं, उनके लिए नैना तरस गई। पहुंच तो गया वो मेरी रूह तक पर, रूह की सिसकी ना पहुंची उस तक। छुपा था अंदर एक समंदर कहीं  बेचैन संवेगों से  विचलित होकर नैनों के प्यालों से छलक गई आज फिर आंखें बरस गईं। समेटती रही उम्र भर  कभी खुद को, कभी टूटे हृदय के चूरे को। जोड़ती रही छोटे - बड़े टुकड़ों को कभी हंस कर  कभी अश्रु धारा में  खुद को भिगोकर। उससे ये भी ना देखा गया टूटे तीखे नुकीले चूरे को कुछ यूं,  अपने हाथों में मसला उसने बची खुची निस्पंद अस्तित्व भी कराह गई मन तो बिखरा सा था ही, देह भी निष्प्राण हो गई। आज एक जिंदगी,  फिर से वीरान हो गई।   (स्वरचित) :- तारा कुमारी (निष्प्राण - उत्साहहीन,जड़ निस्पं द - स्तब्ध,स्थिर अस्तित्व - सत्ता,मौजूदगी वीरान - उजड़ा हुआ संवेग - सुख या दुख की भावना,घबराहट) ( कैसी लगी आपको यह कविता?जरूर बताएं। यदि पसंद आए या कोई सुझाव हो तो कमेंट में लिखे। आपके सुझाव का हार्दिक स्वागत है।) More poems you may like:- 1) बहती नदी - सी 2) सीख रही हूं मैं 3)

बहती नदी - सी Bahti nadi si - Hindi poem

  बहती नदी - सी (हिंदी कविता) Bahti nadi si - Hindi Poem बहती नदी - सी थी मै,शांत चित्त बहती नदी - सी  तलहटी में था कुछ जमा हुआ कुछ बर्फ - सा ,कुछ पत्थर - सा। शायद कुछ मरा हुआ.. कुछ अधमरा सा। छोड़ दिया था मैंने  हर आशा व निराशा। होंठो में मुस्कान लिए जीवन के जंग में उलझी  कभी सुलझी.. बस बहना सीख लिया था मैंने। जो लगी थी चोट कभी जो टूटा था हृदय कभी उन दरारों को सबसे छुपा लिया था कर्तव्यों की आड़ में। फिर एक दिन.. हवा के झोंके के संग ना जाने कहीं से आया एक मनभावन चंचल तितली था वो जरा प्यासा सा मनमोहक प्यारा सा। खुशबूओं और पुष्पों  की दुनिया छोड़ सारी असमानताओं और  बंधनों को तोड़ सहमकर बहती नदी को खुलकर बहना सीखा गया, अपने प्रेम की गरमी से  बर्फ क्या पत्थर भी पिघला गया। पाकर विश्वास हृदय से जोड़े नाते का सारी दबी अपेक्षाएं हुई फिर जीवंत लेकिन क्या पता था - होगा इसका भी एक दिन अंत! तितली को आयी अपनों की याद मुड़ चला बगिया की ओर सह ना सकी ये देख नदी ये बिछड़न ये एकाकीपन रोयी , गिड़गिड़ाई ..की मिन्नतें दर्द दुबारा ये सह न पाऊंगी सिसक सिसक कर उसे बतलाई। नहीं सुनना था उसे, नहीं सुन पाया वो। नह

... सीख रही हूं मैं। Sikh rahi hun main - Hindi poem

.... सीख रही हूं मैं। Sikh rahi hun main - A Hindi poem बदलाव या परिवर्तन जब भी हमारे जीवन में आते हैं हम दो अनुभूतियों में से गुजरते हैं - या तो खुशी या दुख की अनुभूति।किसी को खोने का दुख हो या  कभी जो जिंदगी हम बड़े मज़े में जी रहे होते हैं और उसमें हम आनंद अनुभव करते हैं यदि वह अचानक गुम हो जाए तो हम सहज ही उसे स्वीकार नहीं कर पाते ।ये परिस्थिति हमें दुख का अहसास दिलाती है।हम  सभी कभी ना कभी ऐसे हालातों का सामना अपने जीवन में जरुर करते हैं। कुछ ऐसे ही उद्वेलित करती भावनाओं से गुजरती मन की दशा को उकेरती ये कविता प्रस्तुत है..    ... सीख रही हूं मैं। बात बात पर रूठ जाना और मनाना फिर बड़े शिद्दत से एक दूजे को गले लगाना हो गई  हैं ये गुजरी बातें नश्तर बन कर चुभती हैं अब ये यादें उन जख्मों पर खुद ही मरहम लगाना सीख रही हूं मैं, चोट खाकर मुस्कुराना सीख रही हूं मैं। खनखनाती हंसी और बस बेफिक्र सी बातें उनके बिना ना होती थी दिन और रातें गुम हुए अब वो बचकानी हरकतें वो दीवानगी वो शरारतें हसरतों का दम घोंटना सीख रही हूं मैं, चोट खाकर मुस्कुराना सीख रही हूं मैं। वक़्त ने लिया कुछ यूं करवट  गम ने

बारिश की इक शाम Barish ki ek shaam - Hindi poem

  बारिश की इक शाम  Barish ki ek shaam - Hindi poem ( हिंदी कविता) बारिश की इक शाम Barish ki ek shaam  रिमझिम - रिमझिम बूंदों की बरसात आती है बांध अपने आंचल में प्रेम की सौगात सर्द ठिठुरती हवा के झोंके उस पर नर्म हाथों की छुअन उष्णता देती सहज सौम्य स्पर्श.. बरखा के संगीतबद्ध स्वर में सांसों के आती जाती स्वर लहरियों में घुलमिल जाती है तब ये बारिश की शाम। निर्मल जल से धूले चेहरे भीगे केश और चमकते मुखड़े राग मल्हार के गीत गाता हृदय शब्दों के तार कहीं लुप्त हो जाते हैं, खामोशियां और एहसास ही तब भाषा बन जाते हैं। बारिश की नमी पाकर प्रेम का कोमल बीज  अंतर्मन में जब, नई कोंपल बन सतरंगी अंगड़ाई लेता है। प्रेमसिक्त मधुर मुस्कान गालों पर चुपके से बिखर जाती हैं- बारिश के संग मदहोश शाम,  चुपके से.... दो दिलों की अनकही बातें कह जाती हैं। (स्वरचित) :- तारा कुमारी ( कैसी लगी आपको यह गीत/कविता?जरूर बताएं। यदि पसंद आए या कोई सुझाव हो तो कमेंट में लिखे। आपके सुझाव का हार्दिक स्वागत है।) More poems you may like:- 1)  बेटियां 2) वक्त और त्रासदी 3) संकल्प /प्रतिज्ञा/ इरादा 4) बादल/Cloud

याद है ना तुम्हें Yaad hai na tumhen - A Hindi poem (हिंदी कविता)

  याद है ना तुम्हें Yaad hai na tumhen- Hindi poem (हिंदी कविता) याद है ना तुम्हें / Yaad hai na tumhen याद है ना तुम्हें.. पहली दफा, जब कलम मेरी बोली थी तुम पर शब्दों की कुछ लड़ियां मैंने पिरोई थी। तुम्हारे गुजरे पलों में बेशक मैं नहीं थी तुम्हारे संग भविष्य की अपेक्षा भी नहीं थी हां,वर्तमान के कुछ चंद क्षण साझा करने की ख्वाहिश जरुर थी। याद है ना तुम्हें.. पहली दफा, जब कलम मेरी बोली थी तुम पर शब्दों की कुछ लड़ियां मैंने पिरोई थी। देखो, आज फिर उंगलियों ने मेरी कलम उठाई है कुछ अनसुनी भावनाओं को संग अपने समेट लाई है माना ,मेरे शब्दों ने आहत किया तुम्हें लेकिन क्या,असल भाव को पहचाना तुमने? याद है ना तुम्हें.. पहली दफा, जब कलम मेरी बोली थी तुम पर शब्दों की कुछ लड़ियां मैंने पिरोई थी। उलझ गए तुम निरर्थक शब्दों में पढ़ा नहीं जो लिखा है कोमल हृदय में चल दिए छोड़ उसे, तुम अपनी अना में बंधे थे हम तुम, जिस अनदेखे रिश्ते की डोर में याद है ना तुम्हें.. पहली दफा, जब कलम मेरी बोली थी तुम पर शब्दों की कुछ लड़ियां

धरा / धरती /Dhara/Dharti (Earth) - A Hindi poem

धरा / धरती /Dhara / dharti/Earth - A hindi poem( हिंदी कविता)   धरा/धरती /पृथ्वी पर कविता धरा,माता है हम इनकी संतान सर्वत्र हरियाली,है इसकी शान विविधता है इसकी पहचान। माटी के हैं कई रंग वन और वन्य जीव हैं इनके अंग सदा ही प्रेम दिया है धरा ने मानव को पुलकित होती जैसे देख माता बच्चों को। दात्री है धरा पर हमने है क्या दिया? सर्वदा ही उपभोग किया सुखों का कभी न समझा मर्म, धरा के दुखों का। स्वार्थ में अंधे होकर हम वीरान कर रहे धरा को हरियाली है श्रृंगार इसका बना रहे बंजर इसको। फैला कर प्रदूषण माता के मातृत्व का कर रहे हम दोहन वक़्त रहते हम संभल जाएं.. धरा रूपी माता को  निर्बाध वात्सल्य बरसाने दें, तभी विश्व में होगी खुशियाली समस्त जगत होगी स्वस्थ और निरोगी और  ये धरती भी होगी बलिहारी। (स्वरचित) :- तारा कुमारी (कैसी लगी आपको यह कविता?जरूर बताएं। यदि पसंद आए तो मेरे उत्साहवर्धन हेतू अपना आशीर्वाद दें।और कोई सुझाव हो तो कमेंट में लिखे आपके सुझाव का हार्दिक स्वागत है। )  More poems you may like:- 1. संकल्प/ प्

संकल्प / Sankapl / प्रतिज्ञा / Pratigya/इरादा / Irada/ (Determination) - A Hindi Poem

संकल्प/Sankalp/प्रतिज्ञा/ pratigya/ इरादा irada/ Determination - हिंदी कविता संकल्प / प्रतिज्ञा / इरादा इरादा जो हो सर्वस्व कल्याणकारी जन-जन के हित में जो हो लाभकारी लाख रोड़े खड़े हो जाएं तो क्या दृढ़ निश्चय से कर लो मुट्ठी में दुनिया सारी। ये जगत है फूल और कांटों की क्यारी संकल्प ना टूटे कभी रखो इनसे ऐसी यारी जीवन छोटी है तो क्या पक्के इरादों से खेलो अपनी पारी। कर्तव्य पथ पर पदयात्रा रखो जारी कंधों पर हो चाहे जिम्मेदारी भारी कभी गर मुंह की खानी पड़ी तो क्या हार के बाद जीत होती है सबसे प्यारी। (स्वरचित) :- तारा कुमारी (संकल्प/प्रतिज्ञा/इरादा पर ये कविता - कैसी लगी आपको ?जरूर बताएं। यदि पसंद आए तो मेरे उत्साहवर्धन हेतू अपना आशीर्वाद दें।और कोई सुझाव हो तो कमेंट में लिखे आपके सुझाव का हार्दिक स्वागत है। )  More poems you may like:- 1. मातृत्व 2) बेटियां 3. सपने 4. अनकहे किस्से

मातृत्व / Matritwa / Motherhood - A Hindi poem

मातृत्व /   Matritwa / Motherhood - A Hindi poem ( हिंदी कविता) / मातृत्व पर कविता       मातृत्व नन्हीं सी धड़कन जब स्त्री के कोख में धड़कनों के संग लय मिलाती है,  वह क्षण स्त्री के लिए मातृत्व का अनमोल प्रतीति होती है..  स्त्री स्वत: ही मां में परिवर्तित हो जाती है। मां और अजन्मे बच्चे का अटूट रिश्ता अंतिम सांस तक बंध जाता है, सुकोमल रुई के फाहे सी संतानें जब माता की गोद भर जाते हैं, तब मां सिर्फ एक स्त्री नहीं.. मौत को मात देकर स्वयं के अंश की जननी बन जाती है। मां बच्चे के लिए हर दुख उठाती है हर खुशियां उन पर निछावर करती है जीवन की पहली शिक्षिका माता ही तो होती है हर कठिनाइयों से पार पाने का मंत्र बड़े प्यार से मां बच्चे को सिखलाती है। मां की मातृत्व की व्याख्या नि:शब्द है, जीवन की हर झंझावात की पहरेदार मां ही तो होती है, जीवन-मरण के चक्र में.. स्वर्ग भी मां और ईश्वर की किरदार भी मां होती है । (स्वरचित) :- तारा कुमारी More poems you may like:- 1) बेटियां 2. सपने 3. आऊंगा फिर 4. Father's day (कैसी लगी आपको यह

बेटियाँ/ Betiyan / (Daughters) - A Hindi poem

बेटियाँ/ Betiyan / (Daughters) - A Hindi poem (हिंदी कविता)         बेटियाँ /बेटी पर कविता रिश्तों की एक खूबसूरत एहसास होती हैं बेटियाँ घर की रौनक, उदासियों में खिलखिलाहट अंधियारे में उजियारा होती हैं बेटियाँ.. जीवन डगर की बेशकीमती सौगात होती हैं ये बेटियाँ। निश्छल मन के भावों से ओतप्रोत चिलचिलाती धूप में भी शीतल छांव होती हैं बेटियाँ उम्र के हर पड़ाव में, हर सुख-दुख में, माता-पिता की परछाई होती हैं ये बेटियाँ। जग कहे पराया धन बेटी को पर इंद्रधनुष के सात रंगों की तरह कभी मां, कभी बहन.. ना जाने कितने रिश्तों में बंध जाती हैं ये बेटियाँ। जब हर रिश्ते साथ छोड़ जाते हैं तब पूर्ण समर्पण से अडिग साथ खड़ी रहती हैं ये  बेटियाँ मां की ममता में पली,पिता के गर्व में लिपटी स्वर्ग से उतरी परी होती हैं ये बेटियाँ। परिवार को एक डोर में पिरोकर रखती हैं ये बेटियाँ कम नहीं ये किसी से.. यूं समझ लो - बेमिसाल होती हैं बेटियाँ रिश्तों की एक खूबसूरत एहसास होती हैं बेटियाँ।। (स्वरचित) :-तारा कुमारी (कैसी लगी आपको यह कविता?जरूर बताएं। यदि पसंद आ

बादल Badal/Cloud - Hindi poem

बादल /Badal/Cloud - hindi poem (हिन्दी बाल - कविता)   क्या आपने कभी  नीले आसमान में बादलों को  अठखेलियां करते  देखा है?  बादलों को स्वच्छ नीले आसमान में देखना अभूतपूर्व होता है.. आइए, आज हम  आसमान में बिखरे  बादलों  को कविता के माध्यम से  करीब से देखें.. बादलों की कहानी कहती हुई प्रस्तुत है मेरी यह कविता...   बादल (बाल कविता) उमड़ते घुमड़ते श्वेत चमकीले बादल  संग है इसके नीले आसमान की चादर  ये छोटे बादल, बड़े बादल, सयाने बादल  कभी ये भालू कभी खरगोश की भांति दिखते  बच्चों के मन को ये खूब भाते जरा, इन बादलों की मस्ती तो देखो..  सूरज के संग खेलते ये आंख मिचौली  कभी नारंगी कभी पीत रंग से खेलते ये होली  कभी शांत-चित्त  बिछ जाते आसमान के बिछौने में  कभी खिसकते धीमे-धीमे हवा के मंद चाल में  कभी दूधिया बर्फ-सी पर्वतों के सदृश्य अटल दिखते  हरदम मुस्कुराते आसमान में ये अपनी सुंदरता की छटा बिखेरते  जब आ जाता वर्षा ऋतु..  आते ही ये अपना रंग बदल लेते श्वेत उज्जवल काया को छोड़कर  काला स्याह रूप धर लेते  बिजली रानी भी तब रह रहकर  चमक अपनी दिखाती बाद

सपनें Sapne - A Hindi poem (Motivational poem)

सपनें /Sapne - A Hindi poem (हिन्दी कविता)   हताशा और निराशा कभी भी आशाओं से बढ़कर नहीं होनी चाहिए। जीवन में हार को भी जीत में बदलने की प्रेरणा देती यह कविता आपके समक्ष प्रस्तुत है:-      सपनें कुछ सपने छूट जाते हैं  कुछ सपने टूट जाते हैं और कुछ सपने रूठ जाते हैं।  टूटे सपने घाव दे जाते हैं  जो छूट जाते हैं वो पूरे कब होते हैं  रूठे सपनों में छिपी आशाएं होती हैं  पर आस भी जब टूट जाए तो  ह्रदय में बस  खालीपन घर कर जाते हैं।  मायूस ना होना,  अगर ये लम्हे मिल जाएँ कभी।  सपने तो कुछ टूटेंगे ही  कुछ पूरे होंगे और कुछ रूठेंगे ही  जो मिल गया वह भी कम नहीं  जो ना मिला तो ठहरो नहीं..  हार-जीत तो जीवन की रीत है  धैर्य, साहस और आत्मजय ही मनमीत हैं।  टूटे सपनों को जोड़ना सीख ले जो  जीवन के सतरंगी जंग जीत ले वो कर दृढ़ निश्चय, पथ पर आगे बढ़ो  मुट्ठी में कर लो अपने लक्ष्य को  कर लो सपने पूरे, अपने मन की..। (स्वरचित)  :-तारा कुमारी More poems you may like :- 1. अनकहे किस्से 2. आऊँगा फिर 3. जीवनसंगिनी 4. खामोशी

अनकहे किस्से Ankahe kisse - Hindi poem

 अनकहे किस्से /Ankahe kisse - Hindi poem (हिन्दी कविता)   अनकहे किस्से..  बेपनाह प्यार है तुम्हारे लिए  लेकिन इस दिल में सिर्फ तुम ही नहीं,  प्यार के गीत गुनगुनाती हूं तुम्हारे लिए पर उनको भी सहेज कर रखती हूँ दिल में अपने।  अगर मायने रखते हो तुम मेरे जीवन में वो भी मुस्कुराते हैं मेरे अफ़साने में मेरी हंसी मेरी उदासी में  हो अगर तुम परछाई मेरी  उनके बिना मैं अधूरी हूँ  मेरी खुशी मेरे हर ग़म में।  माना कि मेरी बेइंतेहा चाहत हो तुम पर उनका भी मान ना होगा कभी कम माँ, जिसने मुझे जन्म दिया पिता, जिसने सर पर सदैव स्नेहिल हाथ रखा।  वो भाई-बहन जिसके अप्रतिम प्रेम ने मुझे हमेशा ही तृप्त किया।  वो दोस्त जो निस्वार्थ भाव से  मेरे सुख-दुख के साथी बनते रहे  नहीं जताते कभी कोई हक वो मुझ पर पर दिल में सदा ही बसते हैं वो मेरे।  प्रिय, हो तुम प्रियतम मेरे जो फूल खिलाए हमने मिलकर उसके भी नाम है मेरे ह्रदय का एक टुकड़ा  मेरी सत्ता को मिलकर पूरा करते हैं ये सारे।  बेशक,  जीवन के हमसफर हो तुम  मेरा तन मन ह्रदय तुम्हें समर्पित है पर सच

आऊँगा फिर Aaunga phir - Hindi poem

आऊँगा फिर... /Aaunga phir... A Hindi poem     प्रेम में डूबे अधीर मन को थोड़ी तसल्ली और धैर्य बंधाते हुए एक प्रियतम की अपनी प्रियतमा के लिए उभरे भावनाओं को उकेरती प्रस्तुत कविता...     आऊँगा फिर..  जो है तेरे मन में  वही मेरे मन में  न हो तु उदास  तू है हर पल मेरे पास  अभी उलझा हूँ जीवन की झंझावतों में  रखा हूँ सहेजकर तुझको हृदय-डिब्बी में  जरा निपट लूँ उलझनों से आऊँगा फिर नई उमंग से  करना इंतजार मेरा तू मैं जान हूँ तेरी,जान है मेरी तू  न हो कम विश्वास कभी हमारा चाहे जग हो जाए बैरी सारा इन फासलों का क्या है...  जब मेरे हर साँस हर क्षण में बसी सिर्फ तू ही तू है | (स्वरचित)  :-तारा  कुमारी  More poems you may like:- 1. प्रेम - तृष्णा 2. चाहत 3. किताब की व्यथा 4. फादर्स - डे

प्रेम - तृष्णा /Prem - Trishna - A Hindi - poem

प्रेम - तृष्णा / Prem - Trishna :- A Hindi-poem        प्रेम - तृष्णा शुष्क रेगिस्तान में  शीतल प्रेम की एक बूंद की चाह तपते अग्नि सी बंजर भूमि में  ओस-सी प्रेम की एक बूंद की चाह मृग तृष्णा सी प्रेम की तृष्णा भटकते छटपटाते मन के भाव आस देख दौड़ चला उस ओर पास जाकर कुछ ना मिला मिली तो बस तपती शब्दों की चुभन मन को दुखाती कड़वाहट की तपन बुझ ना पायी मन की तृष्णा कैसी है ये व्यथा कैसी ये घुटन पुष्प रूपी कोमल हृदय को निराशा और वेदना, और घेर आई प्रेम की चाह ये कहाँ ले आई? दर्द के समंदर में गोते लगाते रहे पर साहिल कभी नजर न आई..। :-स्वरचित (तारा कुमारी) More poems you may like also:- 1. मैं हूँ कि नहीं? 2. ना देख सका वो पीर 3. अश्कों से रिश्ता 4. आऊँगा फिर

अश्कों से रिश्ता Ashkon se rishta-a Hindi - poem

अश्कों से रिश्ता Ashkon se rishta - a Hindi - poem   अश्कों से रिश्ता..  अश्कों से कैसा रिश्ता है मेरा?   हर बात पर मचल कर  गालों को चूम लेती है ये ..  बड़ी जिद्दी है ये अश्क  रोकना चाहे जब पलकें  छलकने से इन्हें..  बनकर मोती  लुढ़क जाती  पलकों को मात दे जाती है ये! (स्वरचित)  :-तारा कुमारी More poems you may like:- 1.  मैं हूँ कि नहीं २. Father's -day 3. चाहत ४. खामोशी

मैं हूँ कि नहीं? Main Hun ki nahin? - Hindi-poem

मैं हूँ कि नहीं? Main hun ki nahin? Hindi -poem मैं हूँ कि नहीं? मेरे सुबह सवेरे में तू , तेरे सलोने शाम में.. मैं हूँ कि नहीं? मेरे मचलते जज्बातों में तू , तेरी बातों में.. मैं हूँ कि नहीं? मेरी बेचैनी में तू , तेरे अमन-चैन में.. मैं हूँ कि नहीं? मेरे बदहवास धड़कन में तू , तेरे तरतीब साँसों  में.. मैं हूँ कि नहीं? मेरी निराशाओं में तू , तेरी आशाओं में..मैं हूँ कि नहीं? मेरी शख्सियत में तू , तेरी परछाई में..मैं हूँ कि नहीं? हर लम्हा सोचूँ मैं तुझे , तेरी सोच में ..  मैं हूँ कि नहीं? मेरी खामोशी में तू , तेरी आवाज में .. मैं हूँ कि नहीं? मेरी डूबती सांसों में तू , तेरी अठखेलियां करती जिंदगी में.. मैं हूँ कि नहीं? (स्वरचित) :-तारा कुमारी More poems you may like:- 1. फादर्स-डे २. चाहत ३. खामोशी 4. ना देख सका वो पीर

फादर्स - डे Father's day - A Hindi poem

फादर्स -डे Father's day - A Hindi poem   फादर्स - डे माता है जननी,तो पिता है पहचान इनसे ही होती है जीवन की आन-बान पिता है पुत्री का पहला सच्चा प्यार इनकी छत्र छाया में न होती कभी हार पिता का विश्वास देता पुत्र को आत्मविश्वास हार में भी ये दे जाती है जीत की आस प्यार का अनकहा सागर है पिता  बिना बोले ही समझते ये मन की बात बचपन की नन्ही ऊँगलियों का सहारा है पिता हर तूफान  में कश्ती का किनारा है पिता परिवार की हर सपनों में पंख लगाते हैं पिता सब कुछ खामोशी से सह जाते हैं पिता  सैकड़ों झंझावत को खड़ा अकेले झेलते हैं पिता जीवन के हर कड़वे अनुभव को प्यार से बताते हैं पिता कभी बेटी की विदाई में दिल से रोते हैं पिता फिर 'रखना खयाल बेटी का' हाथ जोड़कर विनती करते हैं पिता बच्चों की जीत से चौड़ी हो जाती है पिता का सीना सब की इच्छा पूर्ण करना ही है उनका जीना  कभी सुख-दुख का मेला है पिता  कभी हंसी ठिठोले तो कभी अनुशासन है पिता है अभिमान तो कभी स्वभिमान है पिता कभी जमीं तो कभी आसमान है पिता सब फलते-फूलते हैं जिनक

चाहत Chahat -Hindi poem

चाहत Chahat-A Hindi poem     चाहत Chahat - Hindi poem  कद्र करना उनकी दिल से  जो आपके गम में रोते हैं..  बहुत कम मिलते हैं ऐसे लोग  जो अपने दुःख में भी आपके दुःख को महसूस करते हैं।  यूँ तो हजार ख्वाहिशें होती उनके भी दिल में  पर ना कोई जिद ना कोई माँग..  आपकी एक हँसी की खातिर  छुपा लेते नम आँखों को हँस कर पल में  ।  दिल ना दुखाना उनका  जो हर नाज़ व नखरों को उठाते हैं..  खुद रूठे हों तब भी वो  आपको रूठे देख मनाते हैं।  नादान सा है दिल उनका  ना तोड़ देना उनका दिल अपनी अना में..  जो अपनी बचपना छोड़ आपके लिए  मुस्कुरा कर बड़प्पन दिखा जाते हैं।  कद्र करना उनकी दिल से  जो आपके गम में रोते हैं..  बहुत कम मिलते हैं ऐसे लोग  जो अपने दुःख में भी आपके दुःख को महसूस करते हैं।  (स्वरचित)  : तारा कुमारी  More poems you may like:- 1 खामोशी  2  दोस्त और दोस्ती /मित्रता 3  ना देख सका वो पीर

खामोशी/Khamoshi/Silence - Hindi poem

ख़ामोशी khamoshi/Silence - Hindi poem ख़ामोशी khamoshi - Hindi poem जब उम्मीदें टूट कर बिखरती हैं लफ्ज़ जुबां से गुम हो जाते हैं  ठहर सा जाता है वक्त सन्नाटा छा जाता है जब जुबां खामोश हो जाती हैं  खामोशी ही शोर मचाती है  सुन पाता वही इस शोर को  जिसने खामोशी ओढ़ी है  बेसबब नहीं होती ख़ामोशी  जब दर्द हद से गुज़र जाता है  हर राह बंद हो जाता है बना मैं सबका साथी ना कोई बना मेरा हमदर्द  रोकने के लाख मशक्कत के बाद भी  जब आँखों से आँसू लुढ़क ही जाते हैं  उँगलियाँ चुपके से उनको पोंछती तब ख़ामोशी ही बेह्तर लगती  जब कोई ना पहुँचे दुखती रग तक  तब ख़ुद को खुद ही समझाना होता है  ना उम्मीद रखो किसी से  दिल को ये बतलाना पड़ता है  ख़ामोशी ही तब हर मर्ज की दवा बन जाती  सुकून व मरहम ज़ख्म की बन जाती  ये सफर है तन्हा और तन्हाई का साथी हैं खुद का खुद ही  बाकी तो सब सफर के मुसाफ़िर होते हैं, पल दो पल के साथी होते हैं.. बाकी तो सब सफर के मुसाफ़िर होते हैं। (स्वरचित)  :- तारा कुमारी  More poems you may like:- .  1)  ना देख सका वो पीर  2)मे

दोस्त और दोस्ती/मित्रता Dost aur Dosti/Mitrata - Hindi Poem

दोस्त और दोस्ती /मित्रता - हिन्दी कविता  दोस्ती सभी रिश्तों में सबसे खूबसूरत रिश्ता होता है और उसे निभाने वाले उससे भी खूबसूरत लोग होते हैं। दोस्त और दोस्ती शब्द हमारे जेहन में आते ही कई बेशकीमती मीठी यादें तैरने लगती है.. है ना..  इन्हीं कई सुखद पलों को जीती ये कविता आपके समक्ष प्रस्तुत है.. दोस्त और दोस्ती /मित्रता Dost aur Dosti /Mitrata /friendship - Hindi poem कुछ रिश्ते होते खून के  कुछ रिश्ते बन जाते दिल के  ना बंधते ये रिश्ते जाति - धर्म से  बस मन में समा जाते एक दूजे के कर्म से  ये रिश्ता है दोस्त और दोस्ती का  जो होता है सबसे ज़ुदा  ना कद देखती ना उम्र देखती  ना देखती ये रंग - रूप  बस मन मिले और हो जाए अजनबी भी मीत  है दोस्ती की अनोखी रीत  दोस्त बन जाते कभी पड़ोसी  तो कभी कोई परदेशी  कभी दोस्त बन जाते  अनजान डगर के राही  दोस्ती की बुनियाद होती विश्वास पर  स्नेह पर, अपनत्व पर  जब सारे रिश्ते छूट जाते  तब भी साथ खड़े रहते ये  दुःख में हौसला देते हैं ये  सुख में संग मस्ती करते  गम को हँसते हँसते बाँट लेते ये  खुशिय

ना देख सका वो पीर Na dekh saka wo pir - Hindi poem

ना देख सका वो पीर  उसने उतना ही समझा मुझको जितना उसने जाना खुदको उसकी बेरूखी ने बंधन तोड़ दिये दिल के एक तरफ आसमाँ रोया टूट के एक तरफ हम रोये फूट  के देखा उसने आसमाँ की बारिश देख सका ना आँखों का नीर भीगा वो बरसात में झूमकर मेरी आँखें रोई उसकी यादों को चूम कर उसका तन भीगा पानी में मेरा मन भीगा आंसुओं में ना देख सका वो पीर ना पोंछ सका वो नीर उसने उतना ही समझा मुझे जितना उसने जाना खुदको उसने उतना ही देखा मुझको जितना उसकी नजरों ने देखा मुझको.. (स्वरचित) :-तारा कुमारी More poems you may like :- 1. मेरा दिल यूँ छलनी हुआ 2. बुरा नहीं हूँ मैं 3. जीवनसंगिनी 4. विरह वेदना

दिल मेरा यूँ छलनी हुआ Dil Mera yun chhalni huwa - Hindi poem

दिल मेरा यूँ छलनी हुआ  तेरे पहलू में आकर भी चैन ना मिला तलाश थी राहत की दिल के बोझ को तुझसे बांट कर कम करने की रोये हम तेरे बाजुओं में टूट कर फिर भी दिल को आराम ना मिला जो तेरे अंदर मेरे लिये शक़ से हम हुए रूबरू सुकून ए दिल और कहीं ज्यादा गुम हुआ ग़म के बोझ को सहा ना गया हमसे दिल मेरा यूँ छलनी हुआ जो टूट कर बिखरे ऐसे कि दोबारा हमसे खुदको समेटा ना गया ख्वाहिश थी चमन में खुशबू बन कर महकने की सौ टुकड़ों में बांट कर बिखेरा गया..! (स्वरचित) :-तारा कुमारी More poems you may like :- 1. बुरा नहीं हूँ मैं 2. जीवनसंगिनी 3. विरह वेदना 4. इन्तेजार

बुरा नहीं हूँ मैं। Bura nahi hun main-Hindi poem

बुरा नहीं हूँ मैं। Bura nahi hun main. - Hindi poem     दुनिया में कई तरह के लोग हैं.. कुछ लोग बेल की तरह होते हैं जो बाहर से तो कठोर होते हैं किन्तु अंदर से कोमल और मीठे होते हैं। उनके ऊपरी स्वभाव से लोग अक्सर ही धोखा खा जाते हैं और उन्हें बुरा समझ लेते हैं।     वहीँ कुछ लोग बेर की तरह होते हैं जो ऊपर से कोमल और मीठे होते हैं किन्तु अंदर से कठोर और सख्त। इन्हीं भावनाओं से ओत-प्रोत ये कविता आप सब के समक्ष प्रस्तुत है - बुरा नहीं हूँ मैं।  हाँ, मैं तीखा बोलता हूँ  सच बोलता हूँ  कड़वा बोलता हूँ  लेकिन, बुरा नहीं हूं मैं।  दिखावे की मीठी बोली नहीं बोलता पीठ पीछे किसी की शिकायत नहीं करता मन में दबाकर कोई बैर भाव नहीं रखता कुंठित विचार नहीं पालता   हाँ, बुरा नहीं हूं मैं।  किसी का बुरा नहीं चाहता किसी पर छुपकर वार नहीं करता  कभी ह्रदय छलनी हो जाए तो छुपकर अकेले रो लेता  सबकी मदद दिल से करता हाँ, बुरा नहीं हूं मैं।  अपनी जिम्मेदारियों से बैर नहीं मुझे कर्म ही मेरी पहचान है छलावे के रिश्ते बनाना नहीं आता मुझे बुरे वक्त में साथ छोड़ना नह

जीवनसंगिनी Jiwansangini - Hindi Poem

    जीवनसंगिनी /पत्नी /Life partner - हिन्दी कविता     जीवन में एक रिश्ता बड़ा ही अनूठा होता है :- पति - पत्नी का रिश्ता। इस संबंध की डोर जितनी कोमल होती है, उतनी ही मजबूत भी। पति - पत्नी का संबंध तभी सार्थक होता है जब उनके बीच प्रेम सदा तरोताजा बनी रहे।     इन्हीं कोमल भावनाओं के साथ यह कविता प्रस्तुत है जिस में एक पति  ने अपनी जीवनसंगिनी के लिये अपने कोमल भावनाओं को अभिव्यक्त किया है।       जीवनसंगिनी  मेरी साँसे हो तुम  मेरी धड़कन हो तुम..  मेरी अर्धांगिनी, मेरी जीवनसंगिनी।  मेरे जीवन का आधार हो,  सात जन्मों का प्यार हो।  माना कि थोड़ी अकड़ती हो तुम,  माना कि थोड़ी जिद्दी हो तुम।  पर तुम ही मेरा साज हो,  तुम ही मेरा नाज हो।  हर सुख दुख की साथी तुम,  मेरे लड़खड़ाते कदमों का सहारा तुम।  बिन तेरे मैं था अधूरा-सा,  करते हो तुम मुझे पूरा-सा।  तू मेरी आदत, तू मेरा संबल  तू मेरी मनमीत, तू मेरी गजल।  तेरे आने से खिला नन्हा पुष्प आंगन में,  है तुझसे अब अटूट रिश्ता जीवन में।  करता हूं मैं दिल से स्वीकार,  हाँ, तुझसे है बेइंतेहा प्यार।  म

विरह - वेदना Virah Vedana Hindi - poem

   विरह - वेदना पर हिंदी कविता / Virah Vedana - Hindi poem/ Painful soul / Separation  विरह - वेदना  शीशे का ह्रदय उस पर नाम लिखा कोई  ठेस लगी टूट गया,चूर हुए सपने  है रोती आंखें, जान सके ना कोई  है दिल तो अपना लेकिन प्रीत पराई   हूक उठी दिल से, अश्कों ने ली जगह आंखों में  क्या हुआ, जान ना पाए कोई  उदास आंखें राह देखती नजरें  ना कोई आस, फिर भी आशा के दीप जले  बुझती, ताकती आशाएं  हृदय को चीरती,  फफक कर रो पड़ती आंखें  क्रंदन करता मन, जान सके ना कोई  साथ ना छोड़ेंगे कभी, ये वायदा था  याद ना रही अब मैं, जो मेरा जीवन था  ना किया स्वीकार गुनाह अपना  लाद दिया हर बोझ मुझ पर   नन्हीं चिड़िया टूट गई,  रूठ गई, जग से छूट गई   था वह कैसा बेरहम दिल   जब मन भरा छोड़ गया  मासूम दिल को तोड़ गया  ना देखा मुड़कर पल भर भी  आंसू बहते अब भी याद में उसके   धोखे थे हसीन, दिल से लगाया था मैंने  सच माना था मैंने, अपना जाना था मैंने  दिल टूट गया,   साथ छूट गया   लेकिन अब भी भरम है वफा का   टूटेगा वह भी धीरे-धीरे   भूल जाना है मुश्किल, क्

इंतज़ार Intezaar-hindi poem

      इंतज़ार कुछ हलचल सी है सीने में सुकून कुछ खोया - सा है जाने कैसी है ये अनुभूति  दिल कुछ रोया - सा है कुछ आहट सी आयी है  और दिल कुछ धड़का - सा है हाथ - पाँव में हो रही कंपन-सी  बेचैनी ये जानी पहचानी - सी है  सांसे भी है कुछ थमी - सी  कितने वक्त गुज़र गये इन्तजार में मेरी आहें लेकिन ना हुई कम पलकें अब मूँदने लगी हैं  साँसें पड़ रही अब क्षीण अब तो आ जाओ इन लम्हों में जाने कब लौटोगे?  आने का वादा था और ना भी था पर, तेरा इन्तज़ार तो था..  सारी हदें तोड़ कर आ जाओ  दुनिया की रस्मों को छोड़ कर आ जाओ  चंद लम्हों के लिए..  अब तो आ जाओ कुछ पल  सिर्फ मेरे लिए.. सिर्फ मेरे लिए | (स्वरचित)  :तारा कुमारी  More poems you may like :- 1. कहते थे साथ ना छोड़ेंगे हम 2. दुःस्वप्न - कोरोना से आगे 3. निःशब्द 4. यादें 5. कुछ पंक्तियां "नवोदय" के नाम

चुनौती Chunautee - A short- story

                     चुनौती  (हम अपने जीवन में प्रत्येक दिन अलग-अलग चुनौतियों का सामना करते हैं |और उस चुनौती का सामना हम किस प्रकार करते हैं, यह हम पर निर्भर करता है|आज ऐसे ही एक चुनौती के साथ स्वाति की कहानी आप सबके साथ साझा कर रही हूं|)           स्वाति की गोद में 9 माह का उसका पुत्र सौरभ बड़े चैन की नींद सो रहा था|वहीं स्वाति की नींद उड़ी हुई थी |          अगले ही महीने उसके पोस्ट- ग्रेजुएशन के प्रथम वर्ष की परीक्षा शुरू होने वाली थी| स्वाति का आधा वक्त कॉलेज में गुजरता तथा घर वापस लौटने पर सौरभ के देखभाल में बाकी वक्त गुजर जाता|         उसे समझ नहीं आ रहा था कि वह परीक्षा की तैयारी कैसे करें?         पति दीपक से कोई खास मदद नहीं मिलती थी|सुबह जल्दी घर से ऑफिस के लिए वह निकल जाते तथा वापसी में देर शाम हो जाया करती| स्वाति घर के काम एवं बच्चे की देखभाल के साथ पढ़ाई भी करती|          स्वाति के लिए सौरभ की देखभाल जहां एक ओर अत्यंत महत्वपूर्ण था तो परीक्षा में अच्छे अंक प्राप्त करना उसका सपना भी था |         लेकिन समय का अभाव था| स्वयं की देखभाल भी माता होने के नाते आ