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Showing posts from 2020

अश्कों से रिश्ता Ashkon se rishta-a Hindi - poem

अश्कों से रिश्ता Ashkon se rishta - a Hindi - poem
  अश्कों से रिश्ता..  अश्कों से कैसा रिश्ता है मेरा? 
 हर बात पर मचल कर
 गालों को चूम लेती है ये ..
 बड़ी जिद्दी है ये अश्क
 रोकना चाहे जब पलकें
 छलकने से इन्हें..
 बनकर मोती  लुढ़क जाती
 पलकों को मात दे जाती है ये!

(स्वरचित)
 :-तारा कुमारी
More poems you may like:- 1. मैं हूँ कि नहीं
२. Father's -day
3. चाहत
४. खामोशी






मैं हूँ कि नहीं? Main Hun ki nahin? - Hindi-poem

मैं हूँ कि नहीं? Main hun ki nahin? Hindi -poem
मैं हूँ कि नहीं? मेरे सुबह सवेरे में तू , तेरे सलोने शाम में.. मैं हूँ कि नहीं?

मेरे मचलते जज्बातों में तू ,
तेरी बातों में.. मैं हूँ कि नहीं?

मेरी बेचैनी में तू ,
तेरे अमन-चैन में.. मैं हूँ कि नहीं?

मेरे बदहवास धड़कन में तू ,
तेरे तरतीब साँसों  में.. मैं हूँ कि नहीं?

मेरी निराशाओं में तू ,
तेरी आशाओं में..मैं हूँ कि नहीं?

मेरी शख्सियत में तू ,
तेरी परछाई में..मैं हूँ कि नहीं?

हर लम्हा सोचूँ मैं तुझे ,
तेरी सोच में ..  मैं हूँ कि नहीं?

मेरी खामोशी में तू ,
तेरी आवाज में .. मैं हूँ कि नहीं?

मेरी डूबती सांसों में तू ,
तेरी अठखेलियां करती जिंदगी में.. मैं हूँ कि नहीं?

(स्वरचित)
:-तारा कुमारी
More poems you may like:-1. फादर्स-डे
२. चाहत
३. खामोशी
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फादर्स - डे Father's day - A Hindi poem

फादर्स -डे Father's day - A Hindi poem
  फादर्स - डे माता है जननी,तो पिता है पहचान इनसे ही होती है जीवन की आन-बान
पिता है पुत्री का पहला सच्चा प्यार इनकी छत्र छाया में न होती कभी हार
पिता का विश्वास देता पुत्र को आत्मविश्वास हार में भी ये दे जाती है जीत की आस
प्यार का अनकहा सागर है पिता  बिना बोले ही समझते ये मन की बात

बचपन की नन्ही ऊँगलियों का सहारा है पिता हर तूफान  में कश्ती का किनारा है पिता

परिवार की हर सपनों में पंख लगाते हैं पिता सब कुछ खामोशी से सह जाते हैं पिता 
सैकड़ों झंझावत को खड़ा अकेले झेलते हैं पिता जीवन के हर कड़वे अनुभव को प्यार से बताते हैं पिता
कभी बेटी की विदाई में दिल से रोते हैं पिता फिर 'रखना खयाल बेटी का' हाथ जोड़कर विनती करते हैं पिता
बच्चों की जीत से चौड़ी हो जाती है पिता का सीना सब की इच्छा पूर्ण करना ही है उनका जीना 
कभी सुख-दुख का मेला है पिता  कभी हंसी ठिठोले तो कभी अनुशासन है पिता
है अभिमान तो कभी स्वभिमान है पिता कभी जमीं तो कभी आसमान है पिता सब फलते-फूलते हैं जिनकी छाँव में.. वो वृक्ष है पिता|
स्वरचित :-(तारा कुमारी) More poems you may like…

चाहत Chahat -Hindi poem

चाहत Chahat-A Hindi poem     चाहत Chahat - Hindi poem  कद्र करना उनकी दिल से  जो आपके गम में रोते हैं..  बहुत कम मिलते हैं ऐसे लोग  जो अपने दुःख में भी आपके दुःख को महसूस करते हैं। 
यूँ तो हजार ख्वाहिशें होती उनके भी दिल में  पर ना कोई जिद ना कोई माँग..  आपकी एक हँसी की खातिर  छुपा लेते नम आँखों को हँस कर पल में  । 
दिल ना दुखाना उनका  जो हर नाज़ व नखरों को उठाते हैं..  खुद रूठे हों तब भी वो  आपको रूठे देख मनाते हैं। 
नादान सा है दिल उनका  ना तोड़ देना उनका दिल अपनी अना में..  जो अपनी बचपना छोड़ आपके लिए  मुस्कुरा कर बड़प्पन दिखा जाते हैं। 
कद्र करना उनकी दिल से  जो आपके गम में रोते हैं..  बहुत कम मिलते हैं ऐसे लोग  जो अपने दुःख में भी आपके दुःख को महसूस करते हैं। 

(स्वरचित)  : तारा कुमारी  More poems you may like:-
1. खामोशी
2. कह कहाँ कुछ पाता वो
3. दोस्त और दोस्ती /मित्रता
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खामोशी/Khamoshi/Silence - Hindi poem

ख़ामोशी khamoshi/Silence - Hindi poem

ख़ामोशी khamoshi - Hindi poem जब उम्मीदें टूट कर बिखरती हैं लफ्ज़ जुबां से गुम हो जाते हैं  ठहर सा जाता है वक्त सन्नाटा छा जाता है जब जुबां खामोश हो जाती हैं  खामोशी ही शोर मचाती है  सुन पाता वही इस शोर को  जिसने खामोशी ओढ़ी है  बेसबब नहीं होती ख़ामोशी  जब दर्द हद से गुज़र जाता है  हर राह बंद हो जाता है
बना मैं सबका साथी
ना कोई बना मेरा हमदर्द  रोकने के लाख मशक्कत के बाद भी  जब आँखों से आँसू लुढ़क ही जाते हैं  उँगलियाँ चुपके से उनको पोंछती तब ख़ामोशी ही बेह्तर लगती  जब कोई ना पहुँचे दुखती रग तक  तब ख़ुद को खुद ही समझाना होता है  ना उम्मीद रखो किसी से  दिल को ये बतलाना पड़ता है  ख़ामोशी ही तब हर मर्ज की दवा बन जाती  सुकून व मरहम ज़ख्म की बन जाती  ये सफर है तन्हा और तन्हाई का
साथी हैं खुद का खुद ही  बाकी तो सब सफर के मुसाफ़िर होते हैं
पल दो पल के साथी होते हैं..
बाकी तो सब सफर के मुसाफ़िर होते हैं
पल दो पल के साथी होते हैं..।
(स्वरचित)  :- तारा कुमारी  More poems you may like:-
1. "ना देख सका वो पीर " का प्रत्युत्तर
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"ना देख सका वो पीर" का प्रत्युत्तर/"Na dekh saka wo pir" ka pratiuttar/"कह कहाँ कुछ पाता वो".. Kah kahan kuchh paata wo - Hindi poem

"ना देख सका वो पीर" का प्रत्युत्तर.. "कह कहाँ कुछ पाता वो " मेरे एक साथी अंक आर्य जी ने मेरी रचना "ना देख सका वो पीर" के प्रत्युत्तर में बेहद खूबसूरती से कुछ पंक्तियाँ लिखी हैं जो मुझे बहुत अच्छी लगी। मैं उनकी सहमति पर उनकी रचना मेरे ब्लॉग में शेयर कर रही हूँ। आशा है, आप सभी को ये जरूर पसंद आएगी।
:- तारा कुमारी 
"ना देख सका वो पीर " का प्रत्युत्तर..  "कह कहाँ कुछ पाता वो.."  देखा उसने भी सब कुछ, पर कह कहाँ कुछ पाता वो...
रेगिस्ताँ में थी हीर खड़ी,
'चेनाब' कहाँ से लाता वो...

छोटी-मोटी कोई सड़क नहीं,
मीलों लंबी वो दूरी थी...
कैसे बतलाता हीर को अब,
राँझा की क्या 'मजबूरी' थी...

रूष्ट हो चुकी हीर ने अब
'कुछ सुनने से इनकार' किया,
लगी 'कोसने' राँझा को,
कि किस 'बैरी' से प्यार किया...

राँझा भी कहकर क्या करता,
दोषारोपण से 'आहत' था...
किस कारण दूरी वो आयी थी,
यह 'वैराग' किस कारण था...

- अंक आर्या

(तारा कुमारी 'जी' की रचना के उत्तर में एक छोटा सा फ़्रेश प्रत्योत्तर) �� �� ^_^ More poems …

दोस्त और दोस्ती/मित्रता Dost aur Dosti/Mitrata - Hindi Poem

दोस्त और दोस्ती /मित्रता - हिन्दी कविता  दोस्ती सभी रिश्तों में सबसे खूबसूरत रिश्ता होता है और उसे निभाने वाले उससे भी खूबसूरत लोग होते हैं। दोस्त और दोस्ती शब्द हमारे जेहन में आते ही कई बेशकीमती मीठी यादें तैरने लगती है.. है ना.. 
इन्हीं कई सुखद पलों को जीती ये कविता आपके समक्ष प्रस्तुत है..

दोस्त और दोस्ती /मित्रता Dost aur Dosti /Mitrata /friendship - Hindi poem
कुछ रिश्ते होते खून के  कुछ रिश्ते बन जाते दिल के  ना बंधते ये रिश्ते जाति - धर्म से  बस मन में समा जाते एक दूजे के कर्म से  ये रिश्ता है दोस्त और दोस्ती का  जो होता है सबसे ज़ुदा  ना कद देखती ना उम्र देखती  ना देखती ये रंग - रूप  बस मन मिले और
हो जाए अजनबी भी मीत  है दोस्ती की अनोखी रीत  दोस्त बन जाते कभी पड़ोसी  तो कभी कोई परदेशी  कभी दोस्त बन जाते  अनजान डगर के राही  दोस्ती की बुनियाद होती विश्वास पर  स्नेह पर, अपनत्व पर  जब सारे रिश्ते छूट जाते  तब भी साथ खड़े रहते ये  दुःख में हौसला देते हैं ये  सुख में संग मस्ती करते  गम को हँसते हँसते बाँट लेते ये  खुशियों को दूना कर देते
कहते हैं उनको गरीब
जिनका ना हो कोई मित्र
अनम…

ना देख सका वो पीर Na dekh saka wo pir - Hindi poem

ना देख सका वो पीर  उसने उतना ही समझा मुझको
जितना उसने जाना खुदको
उसकी बेरूखी ने बंधन तोड़ दिये दिल के
एक तरफ आसमाँ रोया टूट के
एक तरफ हम रोये फूट  के
देखा उसने आसमाँ की बारिश
देख सका ना आँखों का नीर
भीगा वो बरसात में झूमकर
मेरी आँखें रोई उसकी यादों को चूम कर
उसका तन भीगा पानी में
मेरा मन भीगा आंसुओं में
ना देख सका वो पीर
ना पोंछ सका वो नीर
उसने उतना ही समझा मुझे
जितना उसने जाना खुदको
उसने उतना ही देखा मुझको
जितना उसकी नजरों ने देखा मुझको..

(स्वरचित)
:-तारा कुमारी
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दिल मेरा यूँ छलनी हुआ Dil Mera yun chhalni huwa - Hindi poem

दिल मेरा यूँ छलनी हुआ  तेरे पहलू में आकर भी चैन ना मिला
तलाश थी राहत की
दिल के बोझ को तुझसे बांट कर
कम करने की
रोये हम तेरे बाजुओं में टूट कर
फिर भी दिल को आराम ना मिला
जो तेरे अंदर मेरे लिये शक़ से हम रुबरु हुए
सुकून ए दिल और कहीं ज्यादा गुम हुआ
ग़म के बोझ को सहा ना गया हमसे
दिल मेरा यूँ छलनी हुआ
जो टूट कर बिखरे ऐसे
कि दोबारा हमसे खुदको समेटा ना गया
ख्वाहिश थी चमन में खुशबू बन कर महकने की
सौ टुकड़ों में बांट कर बिखेरा गया..

(स्वरचित)
:-तारा कुमारी
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2. जीवनसंगिनी
3. विरह वेदना
4. इन्तेजार




बुरा नहीं हूँ मैं। Bura nahi hun main-Hindi poem

बुरा नहीं हूँ मैं। Bura nahi hun main. - Hindi poem     दुनिया में कई तरह के लोग हैं.. कुछ लोग बेल की तरह होते हैं जो बाहर से तो कठोर होते हैं किन्तु अंदर से कोमल और मीठे होते हैं। उनके ऊपरी स्वभाव से लोग अक्सर ही धोखा खा जाते हैं और उन्हें बुरा समझ लेते हैं।     वहीँ कुछ लोग बेर की तरह होते हैं जो ऊपर से कोमल और मीठे होते हैं किन्तु अंदर से कठोर और सख्त।
इन्हीं भावनाओं से ओत-प्रोत ये कविता आप सब के समक्ष प्रस्तुत है -

बुरा नहीं हूँ मैं।  हाँ, मैं तीखा बोलता हूँ  सच बोलता हूँ  कड़वा बोलता हूँ  लेकिन, बुरा नहीं हूं मैं। 
दिखावे की मीठी बोली नहीं बोलता पीठ पीछे किसी की शिकायत नहीं करता मन में दबाकर कोई बैर भाव नहीं रखता कुंठित विचार नहीं पालता   हाँ, बुरा नहीं हूं मैं। 
किसी का बुरा नहीं चाहता किसी पर छुपकर वार नहीं करता  कभी ह्रदय छलनी हो जाए तो छुपकर अकेले रो लेता  सबकी मदद दिल से करता हाँ, बुरा नहीं हूं मैं। 
अपनी जिम्मेदारियों से बैर नहीं मुझे कर्म ही मेरी पहचान है छलावे के रिश्ते बनाना नहीं आता मुझे बुरे वक्त में साथ छोड़ना नहीं सीखा मैंने  हाँ, बुरा नहीं हूं मैं। 
मौकापरस्त दुनिय…

जीवनसंगिनी Jiwansangini - Hindi Poem

जीवनसंगिनी /पत्नी /Life partner - हिन्दी कविता     जीवन में एक रिश्ता बड़ा ही अनूठा होता है :- पति - पत्नी का रिश्ता। इस संबंध की डोर जितनी कोमल होती है, उतनी ही मजबूत भी। पति - पत्नी का संबंध तभी सार्थक होता है जब उनके बीच प्रेम सदा तरोताजा बनी रहे।     इन्हीं कोमल भावनाओं के साथ यह कविता प्रस्तुत है जिस में एक पति  ने अपनी जीवनसंगिनी के लिये अपने कोमल भावनाओं को अभिव्यक्त किया है। 

     जीवनसंगिनी  मेरी साँसे हो तुम  मेरी धड़कन हो तुम..  मेरी अर्धांगिनी,
मेरी जीवनसंगिनी।  मेरे जीवन का आधार हो,  सात जन्मों का प्यार हो।  माना कि थोड़ी अकड़ती हो तुम,  माना कि थोड़ी जिद्दी हो तुम।  पर तुम ही मेरा साज हो,  तुम ही मेरा नाज हो।  हर सुख दुख की साथी तुम,  मेरे लड़खड़ाते कदमों का सहारा तुम।  बिन तेरे मैं था अधूरा-सा,  करते हो तुम मुझे पूरा-सा।  तू मेरी आदत, तू मेरा संबल  तू मेरी मनमीत, तू मेरी गजल।  तेरे आने से खिला नन्हा पुष्प आंगन में,  है तुझसे अब अटूट रिश्ता जीवन में।  करता हूं मैं दिल से स्वीकार,  हाँ, तुझसे है बेइंतेहा प्यार।  मैं दीया और तू है बाती  है दुआ ये..  रहे सदा तू, मेरी ही जी…

विरह - वेदना Virah Vedana Hindi - poem

विरह - वेदना  शीशे का ह्रदय उस पर नाम लिखा कोई  ठेस लगी टूट गया,चूर हुए सपने  है रोती आंखें, जान सके ना कोई  है दिल तो अपना लेकिन प्रीत पराई   हूक उठी दिल से, अश्कों ने ली जगह आंखों में  क्या हुआ, जान ना पाए कोई
 उदास आंखें राह देखती नजरें  ना कोई आस, फिर भी आशा के दीप जले  बुझती, ताकती आशाएं  हृदय को चीरती,  फफक कर रो पड़ती आंखें  क्रंदन करता मन, जान सके ना कोई
 साथ ना छोड़ेंगे कभी, ये वायदा था  याद ना रही अब मैं, जो मेरा जीवन था  ना किया स्वीकार गुनाह अपना  लाद दिया हर बोझ मुझ पर   नन्हीं चिड़िया टूट गई,  रूठ गई, जग से छूट गई 
 था वह कैसा बेरहम दिल   जब मन भरा छोड़ गया  मासूम दिल को तोड़ गया  ना देखा मुड़कर पल भर भी  आंसू बहते अब भी याद में उसके   धोखे थे हसीन, दिल से लगाया था मैंने
 सच माना था मैंने, अपना जाना था मैंने  दिल टूट गया,   साथ छूट गया   लेकिन अब भी भरम है वफा का   टूटेगा वह भी धीरे-धीरे   भूल जाना है मुश्किल, क्या करें? 
 कुछ तो सुकून मिल जाए दिल को   कुछ ऐसा हो जाए   नहीं देखा जाता इसका तड़पना, तरसना, बरसना   जीना भी जरूरी है, कैसे जिया जाए?   कांपता है देह,   ना मान…

इंतज़ार Intezaar-hindi poem

इंतज़ार कुछ हलचल सी है सीने में सुकून कुछ खोया - सा है जाने कैसी है ये अनुभूति  दिल कुछ रोया - सा है कुछ आहट सी आयी है  और दिल कुछ धड़का - सा है
हाथ - पाँव में हो रही कंपन-सी  बेचैनी ये जानी पहचानी - सी है  सांसे भी है कुछ थमी - सी  कितने वक्त गुज़र गये इन्तजार में मेरी आहें लेकिन ना हुई कम
पलकें अब मूँदने लगी हैं  साँसें पड़ रही अब क्षीण अब तो आ जाओ इन लम्हों में जाने कब लौटोगे?  आने का वादा था और ना भी था पर, तेरा इन्तज़ार तो था.. 
सारी हदें तोड़ कर आ जाओ  दुनिया की रस्मों को छोड़ कर आ जाओ  चंद लम्हों के लिए..  अब तो आ जाओ कुछ पल  सिर्फ मेरे लिए.. सिर्फ मेरे लिए |
(स्वरचित)  :तारा कुमारी 
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चुनौती Chunautee - A short- story

चुनौती  (हम अपने जीवन में प्रत्येक दिन अलग-अलग चुनौतियों का सामना करते हैं |और उस चुनौती का सामना हम किस प्रकार करते हैं, यह हम पर निर्भर करता है|आज ऐसे ही एक चुनौती के साथ स्वाति की कहानी आप सबके साथ साझा कर रही हूं|)           स्वाति की गोद में 9 माह का उसका पुत्र सौरभ बड़े चैन की नींद सो रहा था|वहीं स्वाति की नींद उड़ी हुई थी |          अगले ही महीने उसके पोस्ट- ग्रेजुएशन के प्रथम वर्ष की परीक्षा शुरू होने वाली थी| स्वाति का आधा वक्त कॉलेज में गुजरता तथा घर वापस लौटने पर सौरभ के देखभाल में बाकी वक्त गुजर जाता|         उसे समझ नहीं आ रहा था कि वह परीक्षा की तैयारी कैसे करें?         पति दीपक से कोई खास मदद नहीं मिलती थी|सुबह जल्दी घर से ऑफिस के लिए वह निकल जाते तथा वापसी में देर शाम हो जाया करती| स्वाति घर के काम एवं बच्चे की देखभाल के साथ पढ़ाई भी करती|          स्वाति के लिए सौरभ की देखभाल जहां एक ओर अत्यंत महत्वपूर्ण था तो परीक्षा में अच्छे अंक प्राप्त करना उसका सपना भी था |         लेकिन समय का अभाव था| स्वयं की देखभाल भी माता होने के नाते आवश्यक था| इन सार…

सपनों की उड़ान Sapno ki udaan - hindi short - story

सपनों की उड़ान        मधु के लिए आसमान से अपने करीब बादलों को देखना सिर्फ ख्वाब पूरा होना नहीं था बल्कि एक जंग जीतने जैसा भी था.. बादलों का कभी समंदर की तरह दिखना कभी असंख्य पहाड़ों की तरह दिखना बहुत रोमांचकारी था.. सूर्य की चमकती किरणें  बिलकुल पास प्रतीत होना भी कम रोमांचक न था.        मधु की ये पहली हवाई यात्रा थी. उसने खास तौर से खिड़की वाली सीट खुद के लिए लिया था. इस यात्रा तक  पहुंचने में मधु ने कम उतार चढ़ाव नहीं देखे.
     ..मधु आज भी अपनी हवाई यात्रा को बार बार याद करती और मुस्करा उठती है.. उसके तन-मन मे एक अजीब सी खुशी की लहर दौड़ जाती... सपने पूरे होने के एहसास की खुशी. अपने आप ही चेहरे पर मुस्कान दौड़ जाती.
       जब लॉकडाउन में दूरदर्शन पर रामायण के दुबारा प्रसारण की बात मधु ने सुना तो सहसा उसकी याद ताजा हो गयी और वह  मुस्कुरा उठी..
       रामायण से एक विशेष जुड़ाव था मधु का.. उसके एक सपने का... बात उन दिनों की है जब मधु सिर्फ सात वर्ष की थी| तब पहली बार रामायण टीवी पर प्रसारित हो रहा था उस समय रामायण का जो क्रेज था, वह देखने लायक था|
       लोगों के प…

कर भला तो हो भला - Hindi Short - story

कर भला तो हो भला
       रीना दसवीं कक्षा की छात्रा है तथा अपने माता-पिता तथा भाई-बहनों के साथ गर्मी की छुट्टियां मनाने शहर से गांव आई है |        गांव में अपना पुश्तैनी मकान है |वहां की हरियाली हरे भरे खेत रीना को खूब आकर्षित करते हैं | खास कर दो चीजें- एक तो घर के पास एक तालाब का होना जहां बच्चे मछलियां पकड़ते तथा तालाब के किनारे इमली के पेड़ में झूले डालकर पूरे दिन झूला झूलते |       वहीं घर से कुछ दूरी पर  खेतों के ठीक बीचोबीच एक पुराना शिव मंदिर है जहां रीना प्रत्येक दिन शाम के वक्त जरूर जाया करती तथा माथा टेक कर ही वापस आती| पता नहीं क्यों वहां जाकर रीना को बहुत ही शांति और सुकून महसूस होता| उस मंदिर के शिवलिंग के ऊपर हर वक्त एक छोटे मटके से जल की बूंदें गिरती रहती |         एक दिन की बात है, रीना के साथ उसकी छोटी बहन टीना ने भी शिव मंदिर जाने की जिद की |          टीना कक्षा 6 की छात्रा थी| टीना का स्वभाव बहुत ही चंचल था| वह कभी भी किसी बात को गंभीरता से नहीं लेती और सारा दिन हंसती खेलती व्यस्त रहती|         पिताजी उसे अक्सर ही डांट दिया करते ताकि वह  पढ़ाई पर भी …

मातृ-दिवस Mother's day - Hindi poem

मातृ-दिवस माँ जननी है, जन्मदात्री है  प्रेम की अविरल बहती समंदर है  दुखों को झेलती अडिग पर्वत है  स्नेह की वर्षा करती फुहार है 
ना होती इस रिश्ते में मिलावट  ना होती कभी चेहरे में थकावट  लबों में रहती हरदम दुआएँ  पूत हो जाए कपूत, ना होती कुमाता 
माँ की आँखें थक कर बंद होती भले  पर सोते में भी होती फिक्रमंद  है माँ ही प्रथम शिक्षिका  है माँ ही प्रथम सखा
माँ तो है प्रेम की अनंत सरिता  कैसे व्यक्त करूँ मैं शब्दों में  नहीं समा सकती तुम  शब्दों के अर्थों में.. 
नहीं है मोहताज माँ का प्रेम एक दिवस की,  हर दिन ही है मातृ-दिवस ना देना कभी दुःख माँ को  आदर करो माँ का उम्रभर.. 
यहीं है स्वर्ग यही है धर्म  है मातृ-दिवस की भेंट यही |
(स्वरचित)  :- तारा कुमारी
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यकीन
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यकीन yakin - Hindi poem

यकीन  यकीन - तीन अक्षरों से बना यह शब्द इस के हैं खेल निराले  कभी यकीन कर कोई खिल गया तो किसी के जीवन में पड़ गए शून्य  धोखे मिले हजार कभी कभी सौगात खुशियों की  कभी दोस्त बना दे पल में कभी लगा दे हजार पहरे  जब रूठ जाती है यह बिखर जाता है सब पल में यकीन जब वास करती है मन में  सब कुछ खिल जाता है जैसे पल में अजीब है दास्ताँ यकीन का  नहीं दिलाना पड़ता यहां यकीन नफरत का मगर हैरत है, सबूत मांगते लोग मोहब्बत का एक वक्त वह था जब जादू पर भी यकीन था  एक वक्त यह है  जब हकीकत पर भी शक है अगर करना ही है यकीन  तो कर खुद पर यकीन तू  ना टूटेगा तू कभी, ना रूठेगा तू  हिम्मत जो कभी कम हुई तो उठ खड़ा होगा फिर तू रख विश्वास खुद पर -  है यही रास्ता, नहीं रहेंगे सपने अधूरे मिलेगी मंजिल तुझे, ख्वाब होंगे सारे पूरे|
(स्वरचित)  :-तारा कुमारी More poem you may like :-1. कहते थे साथ ना छोड़ेंगे हम 2. किताब की व्यथा
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दुःस्वप्न-कोरोना से आगे (Nightmare - beyond Corona ) - Hindi poem

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वित्तीय आपातकाल की आशंका है क्या देश को..
केंद्र ही चलाएगा क्या राज्यों को?
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पढ़ाई भी अब हो गयी है ऑनलाइन
क्या गुरुओं का अब महत्त्व रहेगा!
जब ह्वाटसअप से देश चलेगा..  गरीबों की गरीबी अब और बढ़ेगी  पूंजीपतियों की अब खूब चलेगी  मध्यमवर्ग जब नहीं रहेगा
न्याय की लड़ाई तब कौन लड़ेगा  निम्न या उच्च वर्ग ही जब रह जाएगी  एक पर होगा राज, दूसरा भोगेगा विलास जैविक हथियार  के उपयोग से होगा शक्ति-प्रदर्शन  क्या आएगा अब तानाशाही का जेनेरेशन?  है चिंतित करती ये दुर्दशा मन होता विचलित, होती हताशा
है कैसी ये दुःस्वप्न..  क्या होगा इस देश का कल?  है खड़ा  ये विकराल सवाल,  है खड़ा ये विकराल सवाल..!! 
(स्वरचित)  :-तारा कुमारी More Poem you may like :-1. वक्त और त्रासदी
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कहते थे साथ ना छोड़ेंगे हम - Hindi poem

कहते थे साथ ना छोड़ेंगे हम  कहते थे साथ ना छोड़ेंगे हम,  आज वो रिश्ते यूँ रुसवा हो गए |
मेरी होंठो पे हंसी देखेंगे हर दम,  कहने वाले आज बेगाने हो गए|
आँखों में खुशियों की चमक देने वाले,  आज उदासी का आलम दे गए |
छोटी - सी बात का तल्ख क्यूँ इतना,  प्यार के वादे का हर जुमला झूठे हो गए |
इश्क में जला करते थे जो दिन - रात,  अब वो परवाने नफ़रत में जल गए |
हो जाती सुलह माफ़ी दिल में रखने से,  वो तो अपनी जिद के पैमाने हो गए|
हार में ही होती है, मुहब्बत की जीत
जीतने की जुस्तजू में वो जुदा हो गए |
दिल  धड़कता था जिसके लिए हर पल,  वह दिल अब खौफ में गमजदा हो गए|
पहुंच जाते थे मेरी खामोशी में जो मुझ तक,  वो आज लफ्जों में अलविदा कह गए||
(स्वरचित)
:- तारा कुमारी More Poem you may like..1. एहसास 2. उलझन 3. यादें 4. नहीं हारी हूँ मैं

जलेबी Jalebi - A Hindi short - story

जलेबी        स्कूल से आती परेड एवं देशभक्ति गीतों की सुरीली आवाजें कुसुम को घर में भी साफ़ - साफ़ सुनायी दे रही थी |       वह 15 अगस्त, स्वतंत्रता-दिवस का दिन था |बिल्कुल पास में ही स्कूल था|कुसुम एक गृहिणी है उसका एक बेटा है - शुभम, जो लगभग 4 वर्ष का है |       सुबह उठते ही शुभम स्कूल के लिए तैयार होने की जिद कर समय से पहले ही तैयार होकर बैठ गया |       आखिरकार, कुसुम ने खुदको जल्दी से तैयार किया और शुभम को स्कूल छोड़ आयी |
       कुसुम का घर सड़क के एक ओर था तो दूसरी ओर स्कूल था |करीब 200 मीटर की दूरी होगी ¦कुसुम स्कूल पास होने के कारण खुश थी कि वह बच्चे को स्कूल छोड़ने ले जाने में कम समय लगता |
      लेकिन हाईवे के कारण सड़क पर चलने वाली गाड़ियों की लाइन लगी रहती तथा आए दिन कोई न कोई दुर्घटना भी होती रहती|
       शुभम के स्कूल जाने के बाद कुसुम घर के कामों को निपटाने लगी| झंडोत्तोलन के बाद शुभम के स्कूल में कुछ प्रोग्राम  होने वाले थे, उसके बाद छुट्टी|
      दिन के 11:00 बज चुके थे कुसुम घर के सभी काम निपटा कर शुभम के स्कूल जाने की तैयारी करने लगी तभी उसे बाहर कैंपस के गेट के खुलन…

किताब की व्यथा Kitab ki vyatha -Hindi poem

किताब की व्यथा 
दूर बैठी एक स्त्री सिसकती देख, कदम बढ़ गए उस ओर  कंधे पर रखकर हाथ पूछा मैंने - कौन है तू? क्यूं रोती है तू वीराने में? सुबकते हुए कहा स्त्री ने - किताब हूँ मैं... त्याग दिया है मुझे जग ने  बचपन की सुखद सहेली को भुला दिया है सबने..
चंदा मामा, नंदन, सुमन - सौरभ चाचा - चौधरी और नागराज बच्चों का दिल बहलाया मैंने  परियों की कहानी सुनायी  जंगल - बुक की दुनिया दिखाई मैंने नवयुवायों के  प्रेमसिक्त पुष्प को अपने आलिंगन में छुपाया मैंने  सूखे पुष्पों को वर्षों पन्नों में  याद बना कर संजोया मैंने..
कभी कथा - उपन्यास बनकर मुस्कान चेहरे पर खिलाया मैंने इतिहास, भूगोल, चांद - तारे समझाया मैंने.. सिसकती स्त्री ने देह पर लगी धूल दिखाया शब्दों से अपना ज़ख्म मुझे बतलाया सुनकर मेरी तन्द्रा  भंग हुई  सोती हुई से मैं जाग पड़ी  अरे..! ये क्या सपने में बात हुई! किताब से मेरी मुलाकात हुई |
सत्य थी ये व्यथा कथा  हैरान होकर ढाढस बंधाया मैंने  मन ही मन कहा मैंने - बेकार ही दुखी तुम होती हो  आज भी मेरे सिरहाने तुम सोती हो  रोज सुबह - शाम साथ मेरे रहती हो, ज्ञान के अखंड - ज्योत तुम जलाती हो…

सूक्ष्म - शत्रु sukshhm-shatru - Hindi poem

सूक्ष्म - शत्रु है जगत में सूक्ष्म - शत्रु का वार चारो तरफ है फैला  हाहाकार  है बड़ा ये covid-19 विध्वंसकारी अमेरिका, इटली, चाइना सब पर  पड़ गया ये कोरोना वाइरस भारी
छुने से फैले ये, साँसों से फैले  ऐसी है ये महामारी.  कट गए हम दुनिया से  पर कोरोना का है आतंक जारी वाइरस ने लिया सहारा उनका हम से जो हो जाती लापरवाही  ना अन्तर करे ये मजहब की ना अमीरी - गरीबी की समता है इसका उसूल  यह बीमारी है जहान की 
है भयावह दृश्य अब बनता हर तरफ है संक्रमण बढ़ता  आम आदमी कैसे रहें सुरक्षित  नर्स डॉक्टर स्टाफ हुए संक्रमित  देश दुनिया हो रहे बर्बाद  कैसी विडंबना बन पड़ी है आज  बढ़ती जा रही अवधि लॉकडाउन की  आँधी-सी चल रही मन में  आशा - निराशा की. 
है विचलित करने वाली इसका प्रहार पर हमने भी नहीं मानी है हार  हाथ धोना, सोशल - डिस्टेंशिंग है यही कल्याणकारी.  रहो घर के अंदर  करते रहो खुदको सेनेटाइज यही है मांग सुरक्षा की 
है तोड़ना कड़ी - संक्रमण का  लॉकडाउन का पालन  है रास्ता बचने का खुद की करो सुरक्षा और करो सब की परवाह  यही है मूलमंत्र - इसे खत्म करने का |

(स्वरचित)
:तारा कुमारी
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कुछ पंक्तियाँ "नवोदय" के नाम - HINDI POEM

कुछ पंक्तियाँ "नवोदय" के नाम..   वो हसीन नवोदय की जिंदगानी ना मिली फिर वैसी कहानी

जब रखे थे अपने नन्हें कदम
नवोदय के आँगन मे
ऊँची बिल्डिंग और एक कैम्पस
ख़ुद के जैसे थे कुछ, कुछ थे निराले दोस्त
शिक्षक थे माता-पिता समान
साथी थे भाई - बहन

सुबह सुबह मैदान का चक्कर
करते पी.ई. टी मिलकर सब
कुछ करते मन लगाकर
कुछ करते शैतानी
सुबह की धुंध मे कुछ
खुदको छुपा लेते

भागमभाग होती फिर असेंबली की
पर पहुंच ही सब जाते
नाश्ते के लिए लगती लंबी  लाईन
पर फिक्र ना होती ग़र दोस्त हो अपना
चाहे कोई कुछ कहे, बीच मे शान से घुस जाते
मिले थे चम्मच, लेकिन स्वाद
हाथ से खाने से ही आते
छुप छुपाकर खाने की थाली
हॉस्टल मे ले जाते
बीच में पड़ता वार्डेन का क्वाटर
बचते बचाते निकल जाते

सेल्फ स्टडी भी होती मस्ती भरी
जो स्कूल का गेट छु लेते कभी
तो लगता मैदान मार लेते
त्यौहार मिलकर सब  मनाते
होली दिवाली खूब मजे करते

कुछ भूली बिसरी यादें
दोस्तों के मिल जाने से हो जाती ताजा
नाम ही काफी है 'नवोदय' का
पनप जाता अपनापन अजब सा

जिस दिन निकले पलट कर देखा स्कूल को
साथ छुट गया सालों का
आज भी होती आंखे नम
था रिश्ता मासूमियत…

तमन्ना Tamanna - A Hindi short-story

तमन्ना (कई बार हम अपने पास जो कुछ होता है उसकी कदर नहीं करते और उसकी उपेक्षा करते हैं |किन्तु, उसकी अहमियत उन लोगों की नजरों से देखनी चाहिए जो उस कमी से गुज़रते हुए जीते हैं |आज ऐसी ही एक कहानी आप सब के सामने है |)         तमन्ना, प्यारी-सी 4 वर्ष की एक छोटी सी बच्ची है. जिसकी दुनिया उसकी नानी और एक मामा तथा एक मौसी मे सिमटी हुयी है.        उसकी माँ उसे जन्म देते ही भगवान को प्यारी हो गयी थी. नन्ही अबोध बच्ची को देखकर सबकी आँखों में आँसू थे. उसके और भी भाई - बहन थे, पिता भी थे किंतु तमन्ना की नानी ने स्वयं बच्ची के लालन - पालन का बीड़ा उठाने का निर्णय लिया.        तब से तमन्ना अपनी नानी के साथ ही पली - बढ़ी और घर के सभी सदस्यों याने मामा, मौसी, नानी के आँखों की तारा बन चुकी है. तमन्ना के नानाजी पहले ही गुज़र चुके हैं.        तमन्ना, अपनी नानी को ही माता-पिता का दर्जा देती है उससे अथाह स्नेह और ममता प्राप्त करती है.        मामा भी कुछ कम नहीं थे. तमन्ना के साथ खूब मस्ती करते. उसके साथ बच्चे बन जाते. कभी कटहल दिखाकर तमन्ना को भ्रमित करते कि देखो तुम्हारे लिए इत…

निःशब्द NISHABD - HINDI POEM

निःशब्द  गरीबी की मार कहें  या प्रशासन की हार  आम आदमी सहे सौ प्रहार |
पैदल ही चल दिये मीलों घर के लिए  ना हो सका कोई प्रबंध  दे दी जान करीब घर के पहुंचकर  कोरोना के संहार में छिपे हैं ऐसे मर्म  गरीबी की मार कहें
या प्रशासन की हार
आम आदमी सहे सौ प्रहार |

प्रसव - पीड़ा सहती  स्त्री
लगी सौ सौ बंदिशें
कोई रोक ना पाए उन मुसाफिरों को
जो लिए चले गले में कोरोना का हार
गरीबी की मार कहें
या प्रशासन की हार
आम आदमी सहे सौ प्रहार |

जिस जेब में होती थी मेहनत की कमाई
है आज दो सुखी पावरोटी
काम धंधे हुए ठप, पर मिल गए दाल - भात
है समाज सेवियों और सरकार की ये उपकार
गरीबी की मार कहें
या प्रशासन की हार
आम आदमी सहे  सौ प्रहार |

(स्वरचित)
:तारा कुमारी
Nishabd-Hindi poem Garibi ki Maar Kahen Ya prashasan Ki Haar,  Aam aadami Sahe sau Prahar.

Paidal hi Chal Diye milon ghar ke liye
Na Ho Saka Koi prabandh
De Di Jaan Kareeb Ghar Ke pahunch kar corona ke sanghar mein chhipe hain aise marm,
Garibi Ke Mar kahen
Ya prashasan Ki Haar
Aam aadami Sahe sau Prahar.

Prasav pida Sahti stree
Lagi sau sau Bandishen
Koi ro…

नारी, अब तेरी बारी है| Nari, ab teri bari hai. - HINDI POEM

नारी,अब तेरी बारी है| कोरोना से जंग जारी है  नारी,अब तेरी बारी है|
ना मायूस होना, हारेगा ये कोरोना इतिहास गवाह है -  जब जब आई है बला देश में मोर्चा संभाला है सबला ने कभी लक्ष्मीबाई ,कभी रजिया सुल्तान ने ।।
कोरोना से जंग जारी है  नारी, अब तेरी बारी है।
खत्म होगा यह जहर दूर होगा कोरोना का कहर  आबाद होंगे गांव गली शहर ना हिम्मत हारना तू यह काला वक्त भी बीत जाएगा ।।
कोरोना से जंग जारी है  नारी, अब तेरी बारी है ।
आदमी गर ना समझे,  लॉकडाउन का मतलब गली मोहल्लों में भीड़  ,जो दिखे तेरा तेज देखे दुनिया यह सारी है।।
कोरोना से जंग जारी है  नारी,अब तेरी बारी है।
नमन उन बहनों को जो  लेकर लठ निकल पड़ी घर से बाहर समझाने उन हठी पुरुषों को है समता- जागरूकता अब आयी है।।
कोरोना से जंग जारी है नारी,अब तेरी बारी है।।
(स्वरचित) :-तारा कुमारी (यह कविता उन ग्रामीण बहनों को समर्पित है जो लॉकडाउन को सफल बनाने की कोशिश में अपने आस-पास के क्षेत्रों में अपना योगदान दे रही हैं।)


Nari ,ab teri bari hai.
Corona se jung jari hai Nari,ab teri bari hai.
Na mayus hona,harega ye corona Itihaas gawah hai - Jab jab aayi h…

यादें Yaadein Hindi Poem

यादें कलरव करती सहस्त्र यादें उमड़ती घुमड़ती मानस पटल पर कुछ खट्टी कुछ मीठी कुछ गुदगुदाती कुछ उदास कर जाती|
जब मुड़कर देखो पीछे गिरते संभलते हर कदम  जब हम चले थे, कुछ राह छूट गए कुछ छोड़ दिए गए पर रह गई यादें बनकर मुस्कान बनकर याद||
कलरव करती सहस्त्र यादें  उमड़ती घुमड़ती मानस पटल पर  कुछ खट्टी कुछ मीठी कुछ गुदगुदाती कुछ उदास कर जाती |
मन को चुभती,मन को सहलाती  यह रंगीली अनगिनत यादें  पड़ा वक्त का मरहम कभी वक्त ने दिया जख्म कभी  चलती फिरती यह यादें  कभी खामोशी में,कभी बातों में, गले लग जाती यादें||
कलरव करती सहस्त्र यादें उमड़ती घुमड़ती  मानस पटल पर  कुछ खट्टी कुछ मीठी  कुछ गुदगुदाती कुछ उदास कर जाती |
क्रोध-शिकवे भी बन गए मुस्कान  बन गए हंसी ठहाके कभी रूठ कर दूर बैठ जाना  कभी मनाने पर ही मानना ना मिले कोई तो खुद ही मान जाना  मित्रों परिवार संग जीवन की मस्ती||
कलरव करती सहस्त्र यादें उमड़ती घुमड़ती मानस पटल पर कुछ खट्टी कुछ मीठी  कुछ गुदगुदाती कुछ उदास कर जाती |
कभी जीवन में कुछ पाने की खुशी कभी सब खो जाने का डर  कभी इतराते इठलाते हम खुद पर  कभी किसी के जाने का अफसोस  कभी किसी के मिल…

डॉक्टर,नर्स और अस्पताल Doctor Nurse Aur Aspatal Hindi Poem

डॉक्टर, नर्स और अस्पताल जज्बे को रखना कुछ इस तरह उंगलियां ना,काँपे भीड़ देखकर
महामारी फैला रही अपनी चादर तू कर दे इसकी सीमा तय ऊपर एक ईश्वर है, नीचे तू भी कुछ कम नहीं  डॉक्टर ,नर्स और अस्पताल  चलेंगे हम सब मिलाकर ताल|
ना रखे कोई द्वेष जाति धर्म देख ऐसी है इस पेशा का सर्वधर्मभाव  फिर क्यों हम रखे मन में क्लेश  ये हिंदू वो मुस्लिम, ये इसाई वो सिख|
आओ करें सामना आफत का  करके दृढ़ निश्चय..  करे लोक डाउन का पालन,  बनाकर हृदय में जगह  दूरी रखना है मजबूरी पर दिलों में रिश्ते रखना पूरी| 
यही है सद्भाव इस युद्ध की  रहना हर क्षण बनकर मनमीत सबकी  डॉक्टर, नर्स और अस्पताल  चलेंगे हम सब मिलाकर ताल  देखे, क्या कर लेगा यह महामारी रूपी काल!

(स्वरचित)
:-तारा कुमारी
( मेरी यह कविता डॉक्टर, नर्स और अस्पताल के सभी स्टाफ एवं कोरोना महामारी  के विरूद्ध युद्ध में लगे प्रत्येक सैनिक, योद्धाओं को समर्पित है|)

Doctor, nurse aur aspatal - HINDI POEM Jajbe ko Rakhna Kuch Is Tarah  ungaliyan na kanpen Bheed Dekhkar 
mahamari faila Rahi Apni Chadar tu kar de iski Sima tai  Upar Ek Ishwar Hai, niche Tu Bhi Kuchh Ka…

डायरी Diary - A Hindi Short Story

डायरी  सहसा, ठीक पीछे किसी के होने की आहट से मालती पलट कर देखी तो 10 वर्षीय उसका पुत्र अंकित आंखों में निश्छलता लिए कुर्सी के पीछे खड़ा मुस्कुरा रहा था |

रोज की अपनी दिनचर्या पूरी करके घर की जिम्मेदारियों से निपट कर डायरी लिखना मालती की दिनचर्या में शामिल थी| मालती ने अपनी डायरी बंद करते हुए बेटे से पूछा - नींद नहीं आ रही है?

"मम्मी मुझे भी एक डायरी दीजिए ना, मुझे भी आपकी तरह जरूरी बातों को डायरी में लिखना है|" जवाब में अंकित ने एक सांस में ही अपनी बात कह दी |

अंकित की बातें सुनकर मालती ने बेटे को स्नेहपूर्वक देखते हुए पास पड़ी एक नई डायरी उठाकर उसके हाथों में थमा दिया | यह देखते ही अंकित की आंखों में चमक आ गई| वह खुशी से थैंक्यू मम्मी कह कर कमरे से तेजी से निकल गया|

    बेटे को जाते देखने के साथ ही मालती की नजर दीवार पर लगी घड़ी पर पड़ी| रात के 10:00 बज रहे थे| जल्दी जल्दी सब कुछ समेट कर बिस्तर पर आकर लेट गई| पास में छोटा बेटा अब तक सो चुका था वह 6 वर्ष का है|

    लगभग 1 महीने के बाद| रोज की तरह मालती सुबह अंकित के कमरे में झाड़ू लगाने आई| उसके बुक शेल्फ कुछ बिखरे से थे| …